जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context११२ [ १-१५ १४३ । शिकार के लिए निकले एक गीदड ने उन्ह एकाएक देखा । जब वह भाग न सका तो यह केसरी के पैरो में जाकर गिर पडा । "जम्बुक ! क्या बात है ?" "स्वामी ! मै आपके चरणो की सेवा करना चाहता हूँ।" "अच्छा, आ मेरी सेवा कर । में तुझे अच्छे अच्छे मास खिलाऊँगा ।" वह जम्बुक को कञ्चनगुफा में ले गया । गीदड तब से सिंह का मारा हुआ मास ही खाता रहा । कुछ ही दिन में वह मोटा हो गया । एक दिन गुफा मे पडे ही पडे उसे केसरी ने कहा-"जम्बुक ! जा, पर्वत की चोटी पर चढकर पर्वत के नीचे घूमनेवाले हाथी, घोडे तथा भैंसे आदि में से जिस किसी का मास खाना चाहे, आकर मुझसे कह कि मै अमुक पशु का मास खाना चाहता हूँ । ओर मुझे प्रणाम कर यह भी कह कि 'हे स्वामी ! अपना पराक्रम दिखाएँ ।' में उसे मार, उसका मास खा, तुझे भी दूँगा ।" गीदड पर्वत की चोटी पर चढ नाना प्रकार के पशुओ को देख जिसका भी मास खाना चाहता कञ्चनगुफा में आकर सिंह से निवेदन कर उसके पाँव में गिरकर कहता-स्वामी ! अपना पराक्रम प्रकट करें । सिंह जल्दी से छलांग मारकर चाहे मस्त हाथी ही होता उसकी हत्या कर उसका मास स्वय खाता ओर शृगाल को भी देता । गीदड पेट भर कर मास खा, गुफा में जा सो रहता । इस प्रकार ज्यो ज्यो समय व्यतीत हुआ उसके दिल में अभिमान पैदा हो गया । मेरे भी तो चार पैर है । मै क्यो रोज रोज दूसरे पर निर्भर रहता हूँ । अब से मै भी हाथी आदि को मारकर मास खाऊँगा । सिंह भी 'हे मृगराज ! स्वामी ! अपना पराक्रम दिखाएँ' कहने पर ही हाथियो को मारता है, मै भी सिंह से यह कहलवाऊँगा कि 'हे जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा' और एक बडिया हाथी को मार उसका मास खाऊँगा । उसने शेर से कहा-स्वामी ! मैने बहुत देर तक आपके मारे हुए हाथियो का मास खाया । मै भी एक हाथी को मारकर उसका मास खाना चाहता हूँ । जिस जगह आप कञ्चनगुफा में लेटते है, मै वहाँ लेट रहूँगा । आप पर्वत के नीचे घूमनेवाले हाथी को देख मेरे पास आकर कहें 'जम्बुक ! अपना पराक्रम