जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextपुप्फरत्त ] १२१ अपि नु हनुका सन्ता, हमारी दाढ़ थक गई। ओरमाम न पारेम, हम अपना बल लगाकर समुद्र का पानी निकाल बाहर करना चाहते हैं, लेकिन हम खाली नहीं कर सकते, यह पूरतेव महोदधि । इस प्रकार कहते हुए वे सभी कौए रोने लगे—उस कौवी की ऐसी चोच थी ! ऐसी गोल गोल आँखें थीं ! ऐसा सुन्दर आकार-प्रकार था ! ऐसा मधुर शब्द था ! वह इस घोर समुद्र के कारण नष्ट हो गई । उन्हे इस प्रकार विलाप करते देख समुद्र-देवता ने भयानक रूप दिखाकर भगाया । इस प्रकार उनका कल्याण हुआ । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कौवी यह पूर्व की भार्या थी । कौवा बूढा स्थविर था । बाकी कौवे अन्य बूढे स्थविर थे । समुद्र-देवता तो मैं ही था ।
१४७. पुप्फरत्त जातक “नयिद दुक्खं अदु दुक्खं...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक उद्विग्न-चित्त भिक्षु के बारे में कही । क. वर्तमान कथा भगवान् ने उससे पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उद्विग्न चित्त है ? वह बोला—हाँ, सचमुच । “तुझे किसने उत्तजित किया ?” पूछने पर उसने कहा—“मेरी पहली भार्या ने । भन्ते ! उस स्त्री के हाथ में मधुर रस है। मैं उसके बिना नही रह सकता ।” शास्ता ने कहा—‘भिक्षु ! यह तेरा अनर्थ करनेवाली है। तू इसके कारण पहले भी सूली पर चढ़ाया गया। इसी के कारण रोता हुआ मरकर