जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१२२ [ १.१५ १४७ तू नरक मे पैदा हुआ । अब फिर तू उसे ही क्यो चाहता है ?” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही । ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व आकाश-स्थित देवता हुए । वाराणसी में कार्तिक मास की रात्रि का उत्सव हुआ । नगर देवनगर की तरह सजाया गया । सब लोग उत्सव मनाने में मस्त थे । एक दरिद्र आदमी के पास केवल एक ही मोटे कपड़े का जोड़ा था । उसने उसे अच्छी तरह धुलवाकर स्त्री कराके उसमें सैकडो, हजारो चुनन देकर रक्खा था । उसकी भार्या बोली—“स्वामी ! मेरी इच्छा है कि केसर के रंग का एक वस्त्र पहन तेरे गले से लग कार्तिक रात्रि के उत्सव में विचरूँ ।” स्वामी बोला—“भद्रे ! हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ से आएगा ? शुद्ध वस्त्र पहन कर खेल ।” “केसर रंग न मिलने पर उत्सव न खेलूँगी । तू दूसरी स्त्री लेकर खेल ।” “भद्रे ! मुझे क्यो कष्ट देती है ? हम दरिद्रो के पास केसर कहाँ ?” “स्वामी ! पुरुष की इच्छा हो तो क्या नही है ? क्या राजा के केसर- बाग में बहुत केसर नही है ?” “भद्रे ! वह स्थान राक्षसो से सुरक्षित तालाब की तरह बहुत बलवान आदमियो से सुरक्षित है । वहाँ नही जा सकता । तू उसकी इच्छा मत कर । जो है उसी से सन्तुष्ट रह ।” “स्वामी ! रात को अन्धकार होने पर क्या कोई ऐसी जगह है जहाँ आदमी नही जा सकता ।” उसके बार बार कहने से आसक्ति होने के कारण उसने उसकी बात स्वीकार कर कहा—“अच्छा, भद्रे ! चिन्ता मत कर ।” इस प्रकार उसे आश्वासन दे, रात को, जीवन का मोह छोड़ नगर से निकल राजा के केसर-बाग पर जा वहाँ बाड को तोड़ बाग में दाखिल हुआ । पहरे- दारो ने बाड के शब्द को सुन ‘चोर है’ समझ घेर कर पकड़ लिया । फिर गसी