जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context१८४ [ २.१.१६० मिथिला में घर लेकर रहने वाला। आज्ञञ्जा, कारण, अकारण जानने वाले, यथा हंसा विनीलकं, जैसे यह हंस मुझ विनीलक को ढो रहे हैं, उसी प्रकार खींच रहे हैं। हंस-बच्चों ने उसकी बात सुनी तो उन्हें क्रोध आया। उन्होंने सोचा इसे यही गिरा जायें। लेकिन फिर सोचा ऐसा करने से हमारा पिता हमें क्या कहेगा ? उसकी निन्दा के डर से वे उसे पिता के पास ले गए और उसकी करतूत पिता से कही। पिता को क्रोध आया। वह बोला—'क्या तू मेरे पुत्रों से बढ़कर है जो उनको नीचा दिखा रथ में जुतने वाले घोडो के समान बनाता है ? अपनी बिसात नही जानता ? यह स्थान तेरे योग्य नही है। जहाँ तेरी माँ रहती है, वहीं जा।' इस प्रकार धमका कर दूसरी गाथा कही— विनील ! दुग्गं भजसि अभूमिं तात ! सेवसि, गामन्तिकानि सेवस्सु एतं मातालयं तव ॥ [विनील ! तू दुर्ग में रहता है ) तात ! तू अयोग्य स्थान में रहता है। तू ग्राम के आसपास रह। वह तेरा मातृ-गृह है।] विनील उसे नाम से बुलाता है। दुग्गं भजसि, इनके साथ गिरि-दुर्ग में रहता है। अभूमिं तात ! सेवसि तात ! गिरि विषम स्थान, तेरे लिए अयोग्य स्थान है। तू अभूमि में वास करता है। एतं मातालयं तव, यह ग्राम के सिरे पर जो कूड़ा फेंकने की जगह है तथा कच्चा श्मशान है वही तेरी माता का निवास-स्थान है। तू वहीं जा। इस प्रकार उसे धमका कर पुत्रों को आज्ञा दी—जाओ, इसे मिथिला नगर की कूड़ा डालने की जगह पर ही उतार आओ। उन्होने वैसा ही किया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय विनीलक देवदत्त था। दो हंस-बच्चे दो अग्र-श्रावक थे। पिता आनन्द था। विदेहराज तो मैं ही था।