जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनीलक ] १८३
जाकर सब विद्याए सीखी । पिता के मरने पर राज्य गद्दी पर बैठे। उस समय एक स्वर्ण हंसराज का चुगने की जगह पर एक कौवी से सहवास हो गया । उसे पुत्र हुआ । वह न माता के सदृश था, न पिता के सदृश । उसका रूप रंग भद्दा नीला होने से उसका नाम विनीलक ही हो गया । हंसराजा सदैव पुत्र को देखने जाता । उसके दो दूसरे हंस-बच्चे पुत्र थे। उन्होंने पिता को हमेशा बस्ती की ओर जाते हुए देखकर पूछा—"तात ! तुम हमेशा बस्ती की ओर क्यो जाते हो ?" "तात ! एक कौंवी से सहवास होकर मुझे एक पुत्र हुआ । उसका नाम विनीलक है । मैं उसे देखने जाता हूँ।" "वह कहाँ रहते है ?" 'विदेह राष्ट्र में मिथिला के पास अमुक जगह पर एक ताड के वृक्ष पर रहते हैं।" "तात ! बस्ती सशंकित जगह है । वहाँ खतरा होता है । तुम न जाओ । हम जाकर उसे ले आएगे।" दोनो हंस-बच्चे पिता के बताए हुए निशान से वहाँ पहुँच उस विनीलक को एक डण्डे पर बिठा चोच से डण्डे के सिरो को पकड मिथिला नगर के ऊपर से चले । उस समय विदेह राज सर्वश्वेत चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर की परिक्रमा कर रहे थे । विनीलक ने उसे देख मन में कहा—"मुझ में विदेह- राज में क्या अन्तर हैं ? यह चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर में घूमता है । मै हंस जुते रथ में बैठकर जा रहा हूँ।" उसने आकाश से जाते हुए यह गाथा कही— एवमेव नून राजान वेदेह मिचिलग्गहं, अस्सा वहन्ति आजञ्जा यथा हंसा विनीलकं ॥ [ जैसे हंस विनीलक को ढो रहे हैं उसी तरह से श्रेष्ठ घोडे मिथिला के विदेहराजा (के रथ) को खीचते हैं ।] एवमेव, इसी तरह, नून, सर्वल्प विकल्प विषयक निपात है । 'निश्चय से' भी ठीक अर्थ है । वेदेह, विदेह राष्ट्र के स्वामी को । मिथिलग्गह, मिथिलागेह