जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
DevanagariHindipublished479 pages
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ककण्टक ] २१३ वह सीमित कर्म उस महान् कर्म के अन्दर, उस महान् कर्म में मिलकर, फल देने में असमर्थ हो रहता है, अपना फल नहीं दे सकता। वह महान् कर्म ही उसे ढक देता है, महान् कर्म ही फल देने वाला रहता है। इस प्रकार बोधिसत्त्व अपने शिष्यो को मैत्री-भावना का फल कह ध्यान में अवस्थित रह ब्रह्मलोक में पैदा हो सात सवत्तं-विवत्तं कल्प तक फिर इस लोक में नहीं आए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।• उस समय ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। अरक नाम का उपदेशक तो मै ही था। १७०. ककण्टक जातक “नायं पुरे श्रोनमति' •” यह ककण्टक जातक महाउम्मग जातक१ में आएगी। १ महाउम्मग जातक (५४६)