BharatKosha
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

Page 229 of 479

Read in context
Page 229

दूसरा परिच्छेद ३. कल्याणधम्म वर्ग १७१. कल्याणधम्म जातक "कल्याण धम्मो " यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बहरी सास के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में एक कुटुम्बिक रहता था। वह श्रद्धावान् था। वह प्रसन्न- चित्त था। वह त्रिशरण ग्रहण किए था और पञ्चशील भी। एक दिन वह घी आदि बहुत सी औषधियाँ,¹ पुष्प, सुगन्धियाँ तथा वस्त्र ले शास्ता से धर्म सुनने की इच्छा से जेतवन गया। उसके वहाँ गए रहने पर सास खाद्य-भोजन ले लडकी को देखने की इच्छा से लडकी के घर आई। वह थोडी बहरी थी। जब लडकी के साथ खाना खा चुकी, तो भोजनोपरान्त आराम करते हुए उसने लडकी से पूछा—'अम्म ! क्या तेरा पति तुझसे प्रसन्न है ? क्या वह विवाद न करता हुआ, प्रेमपूर्वक रहता है ?" 'अम्म ! क्या कहना ! जैसा तुम्हारा जँवाई है, वैसा शीलवान् तथा सदाचारी प्रव्रजित भी मिलना दुर्लभ है।" उस उपासिका ने लडकी की सारी बात पर भली प्रकार ध्यान न दे


¹ घी, मक्खन आदि औषध रूप से भिक्षु अपराह्न में भी ग्रहण कर सकता है।