जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
Page 244 of 479
Read in contextकळायमुट्ठि ] २२६ बहुत की ओर ध्यान न दे थोडे की ओर ध्यान देने वाले दुर्बुद्धि मूर्ख जन ऐसा करते ही हैं।' इतना कह, पहली गाथा कही— बालो यतायं दुमसाखगोचरो पञ्ञा जनिन्द ! नयिमस्स विज्जति, कळायमुट्ठिं अवकिरिय सेयतं एकं कळायं पतितं गवेसति ॥ [ राजन् ! यह वृक्षों की शाखाओ पर घूमने वाला बन्दर मूर्ख है। इसे प्रज्ञा नहीं है। यह मटर की सारी मुट्ठी को बगेर कर गिरे हुए एक मटर को खोजता है।] दुमसालगोचरो बन्दर, यह वृक्षों की शाखा पर रहता है, इसके रहने की जगह इसके घूमने की जगह है, इसलिए वृक्षों की शाखा पर घूमने वाला कहलाया। जनिन्द, राजा को सम्बोधन करता है, परम ऐश्वर्यशाली होने से, राजा जनता के इन्द्र हैं; इसीलिए जनिन्द। कळायमुट्ठि मटर की मुट्ठि, काले मास की मुट्ठि भी कहते हैं। अवकिरिय वखेर कर सेयतं सय गवेसति भूमि पर गिरे एक ही मटर को खोजता है। ऐसा कहकर बोधिसत्त्व ने फिर राजा को सम्बोधन कर दूसरी गाथा कही— एवमेव मयं राज ! ये चञ्ञे अतिलोभिनो अप्पेन बहुजिज्याम कळायेनेव वानरो ॥ [ इसी प्रकार हे राजन ! हम और दूसरे अत्यन्त लोभी लोग थोडे के लिए बहुत की हानि कर देते हैं; जैसे बन्दर ने एक मटर के लिए।] सक्षिप्तार्थ इस प्रकार है—महाराज ! एवमेव मयं और अञ्ञे च सभी लोभी जन अप्पेन बहुं जिज्याम हम ही अब इस वर्षा काल में, इस अयोग्य समय में रास्ते पर चलकर थोडे से लाभ के लिए बहुत सी हानि करेंगे। कळायेनेव वानरो जैसे इस बन्दर ने एक मटर को ढूँढते हुए, उस एक मटर