जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context२३० [ २.२.१७७ के कारण सब मटर गंवाए, उसी प्रकार हम भी असमय में जब कन्दराएँ और दरारें पानी से भरी हैं, छलने पर छोटे से लाभ के लिए बहुत से हाथी घोड़ों तथा सेना को गँवाएँगे। इसलिए असमय में जाना उचित नहीं। यूँ राजा को उपदेश दिया। राजा उसकी बात सुन वहीं से लौट कर वाराणसी नगर में वापिस चला गया। चोरों ने सुना कि राजा चोरों को दबाने के लिए नगर से निकल पड़ा है, ये इलाके से भाग गए। वर्तमान समय में भी चोरों ने जब यह सुना कि कोशल राजा निकल पड़ा है, वह भाग गए। राजा ने शास्ता का धर्मोपदेश सुना। फिर आसन से उठ, प्रणाम और प्रदक्षिणा कर श्रावस्ती को चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १७७. तिन्दुक जातक “धनुहत्थकलापेहि. ” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय प्रज्ञा पार- मिता के बारे में कही। क. वर्तमान कथा महाबोधि जातक¹ तथा उम्मग्ग जातक² (में आए वर्णन) की तरह शास्ता ने अपनी प्रज्ञा की प्रशंसा सुन कर कहा—“भिक्षुओ ! तथागत केवल ¹ महाबोधी जातक (५२८) ² उम्मग्ग जातक (५४६)