जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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तालाब और नदी एक थे, उसी समय उस तालाब से निकल नदी में चले गए। एक कछुवे ने कहा—यहाँ में पैदा हुआ हूँ। यहीं बड़ा हुआ हूँ। यहीं मेरे मातापिता रहे हैं। में इसे नहीं छोड़ सकता। वह नदी में नहीं गया। गरमी पड़ने पर उस तालाब का पानी सूख गया। यह कछुवा जिस जगह बोधिसत्व मिट्टी खोदते थे, उसी जगह ज़मीन खोदकर उसमें घुसा था। बोधि- सत्त्व ने मिट्टी लेने के लिए वहाँ जाकर, बड़ी कुदाल से ज़मीन खोदते हुए उसकी पीठ तोड कर, मिट्टी के ढेर की ही तरह उसे भी कुदाल से उठाकर स्थल पर गिराया। उसने वेदना से पीडित हो कहा कि मैं घर के प्रति आसक्ति को त्याग, उसे छोड़ न सका, इसीलिए विनाश को प्राप्त हुआ। और रोते हुए यह गाथाएँ कहीं— जनित्तम्मे भवित्तम्मे इति पङ्के अवस्सरिं तं मं पङ्को अज्झभवि यथा दुब्बलकं तया तं तं वदामि भग्गव ! सुणोहि वचनं मम ॥ गामे वा यदि वा रञ्ञे सुखं यत्राधिगच्छति त जनित्तं भवित्तं च पुरिसस्स पजानतो यम्हि जीवे तम्हि गच्छे न निकेतहतो सिया ॥ [ में यहाँ पैदा हुआ। में इसीमे वढा। यह सोच कर में पङ्क में ही रहा। लेकिन मुझ दुर्बल को जैसे पङ्क ने परास्त किया, हे कुम्हार ! में वैसे वैसे तुझे कहता हूँ सुन— ग्राम या अरण्य में जहाँ आदमी को सुख प्राप्त हो, वही बुद्धिमान आदमी की जन्म-भूमि हैं, वही पलने की जगह है। जहाँ रहकर जी सकता हो, वही जाए। घर में रहकर मरने वाला न बने । ] जनित्तम्मे भवित्तम्मे यह मेरे पैदा होने की जगह है, यह बढ़ने की जगह है। इति पङ्के अवस्सरिं इस हेतु से मैंने इस कीचड में आश्रय लिया, पड़ा रहा, रहने लगा। अज्झभवि, पराभूत हुआ, विनाश को प्राप्त हुआ। भग्गव कुम्हार को बुलाता है। कुम्हारो का यही नाम गोत्र तथा प्रज्ञप्ति है—यह