जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context२३६ [ २३.१७८ भाग्यवान् ।¹ सुखं, शारीरिक तथा मानसिक आनन्द। तं जनित्त भवित्तञ्च वह पैदा होने का तथा पलने का स्थान है। जनित भावित दीर्घाकार भी पाठ है, अर्थ यही है। पजानतो, जो अर्थ अनर्थ तथा कारण अकारण को जानता हैं। न निकेतहतो सिया, घर में आसक्ति कर, किसी दूसरी जगह न जा, घर में मरा। इस प्रकार मरण रूपी दुख को प्राप्त करने वाला न बने। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व से बोलते ही बोलते मर गया। बोधिसत्त्व ने उसे ले ग्राम के सारे निवासियो को इकट्ठा कर उन्हे उपदेश देते हुए कहा— "इस कछुए को देखते हैं ? जब दूसरी मछलियां तथा कछुए महानदी में चले गए तो यह अपने निवास स्थान में आसक्ति न छोड़ सकने के कारण उनके साथ नही गया। जहाँ से मिट्टी ली जाती है, वही पडा रहा। मैने मिट्टी खोदते हुए, महाकुदाल से इसकी पीठ तोड कर इस मिट्टी के ढेले की तरह इसे जमीन पर गिरा दिया। इसे अपना किया याद आया। दो गाथाएँ कह यह रोता हुआ मर गया। इस प्रकार यह अपने निवास स्थान के प्रति आसक्ति कर मर गया। तुम भी इस कछुए की तरह न होना। अब से तृष्णा के वश होकर उपयोग करते हुए यह मत समझो कि यह रूप मेरा है, यह शब्द मेरा है, यह सुगन्ध मेरी है, यह रस मेरा है, यह स्पर्शितव्य मेरा है, यह पुत्र मेरा है, यह लडकी मेरी है, यह दास-दासियाँ तथा यह सोना मेरा है। यह प्राणी अकेला ही तीनो भवों में चक्कर काटता है।" इस प्रकार बोधिसत्त्व ने बुद्ध-लीला से जनता को उपदेश दिया। वह उपदेश सारे जम्बूद्वीप में फैल कर सात सो वर्ष² रहा। जनता बोधिसत्त्व के उपदेश के अनुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर स्वर्ग को गई। बोधिसत्त्व ने भी उसी तरह पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग का रास्ता लिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक ¹ आजकल कुम्हारों को कहीं कहीं 'प्रजापति' कहते है। ² फोसबोल की प्रति में 'वस्स सहस्सानि' पाठ है।