जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextसङ्गामावचर ] २५१ “नन्द ! तूने तावतिंस-भवन¹ देखा है ?” “भन्ते ! नही देखा ?” “नन्द ! आ तुझे तावतिंस भवन दिखाएँ ।” शास्ता उसे वहाँ ले जा पाण्डु-कम्बल शिला आसन पर बैठें। दोनो देव- लोकों के देवताओ सहित देवेन्द्र शक्र-राजा ने आकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गया। उसकी ढाई करोड सेविकाएँ और कबूतरी की तरह लाल पाँव वाली पांच सौ अप्सराएँ भी आकर, प्रणाम कर एक ओर बैठीं। शास्ता ने नन्द को ऐसा किया कि वह उन पाँच सौ अप्सराओ पर आसक्त हो उन्हें बार बार देखने लगा। “नन्द ! कबूतरी जैसे पाँव वाली इन अप्सराओ को देखता है ?” “भन्ते ! हाँ ।” “क्या यह अच्छी लगती है, अथवा जनपदकल्याणि ?” “भन्ते ! जनपदकल्याणि की तुलना में जैसे यह लुजी बन्दरी थी, उसी तरह इनकी तुलना में जनपदकल्याणि है।” “नन्द ! अब क्या करेगा ?” “भन्ते ! क्या करने से यह अप्सराएँ मिल सकेगी ?” “श्रमण धर्म पूरा करने से ।” “यदि भन्ते ! आप मुझे इन्हें दिलाने के जिम्मेवार हो तो मै श्रमण- धर्म पूरा करूँगा ।” “नन्द ! कर। मै जिम्मेवार होता हूँ।” इस प्रकार देवसमूह के बीच में स्थविर ने तथागत को जिम्मेवार ठहरा कर कहा—“भन्ते ! देर न करें। आएँ चलें। मै श्रमण धर्म करूँगा ।” शास्ता उसे ले जेतवन चले आए। स्थविर ने श्रमण-धर्म करना आरम्भ किया। शास्ता ने धर्मसेनापति सारिपुत्र को सम्बोधन कर कहा—“सारिपुत्र ! मेरे छोटे भाई नन्द ने त्रयस्त्रिंशत् देवलोक में देवसमूह के बीच अप्सराऐं
¹ त्रयस्त्रिंशत् देवताओ का भवन।