जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context२५२ [ २.४.१८२ दिलाने के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया है। इस उपाय से महामौद्गल्यायन स्थविर, महाकाश्यप स्थविर, अनुरुद्ध स्थविर, धर्मभण्डारी आनन्द स्थविर, अस्सी महाश्रावकों तथा प्रायः करके शेष सभी भिक्षुओं को कहा। धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर ने नन्द स्थविर के पास जाकर कहा—आयुष्मन् ! क्या तूने सचमुच त्रयस्त्रिंशत् लोक में देवसमूह के बीच अप्सराएँ मिलें तो श्रमण- धर्म करूँगा, इसके लिए दसबलधारी (बुद्ध) को जामिन ठहराया है ? यदि ऐसा है तो तेरा ब्रह्मचर्य-जीवन स्त्रियों के लिए है, आसक्ति के लिए है। यदि तू स्त्रियों के लिए श्रमण-धर्म कर रहा है तो तुझ में और उस मजदूर में क्या अन्तर है जो मजदूरी के लिए काम करता है ?" इस प्रकार नन्द स्थविर को लज्जित किया, निस्तेज किया। इसी तरह सभी अस्सी महाश्रावकों ने तथा शेष भिक्षुओं ने उस आयुष्मन् को लज्जित किया। उसे लज्जा आई और निन्दा-भय के कारण उसने दृढ़ पराक्रम कर विप- श्यना-भावना बढ़ा अर्हत्व प्राप्त किया। फिर शास्ता के पास जाकर कहा— "भन्ते ! मैं आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त करता हूँ।" शास्ता ने कहा—"नन्द ! जिस समय तूने अर्हत्व प्राप्त किया, उसी क्षण में अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।" यह समाचार सुन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बात चीत चलाई—"यह आयुष्मन् नन्द स्थविर उपदेश के कितने अधिकारी हैं। एक बार उपदेश देने से ही लज्जा तथा निन्दा-भय का ख्याल कर श्रमण-धर्म करके अर्हत्व प्राप्त कर लिया।" शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, न केवल अभी, पूर्व में भी नन्द उपदेश का अधिकारी ही रहा है।" फिर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हाथी-शिक्षक के कुल में पैदा हुए। बडे होने पर हाथी-शिक्षा के कार्य में