जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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माता-पिता, अन्य नातेदार, मित्र अमात्य तथा ब्राह्मण गृहपति आदि “महाराज ! सस्कार अनित्य है . ” कहते हुए उसे होश में न ला सके। उसके रोते पीटते ही सात दिन बीत गए। उस समय पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो के लाभी, तपस्वी होकर हिमवन्त प्रदेश में विचरते हुए बोधिसत्त्व ने प्रकाश फैला दिव्य चक्षु से जम्बु द्वीप को देखते हुए उस राजा को उस प्रकार रोते देखा। 'मुझे इसकी सहायता करनी चाहिए' सोच ऋद्विबल से आकाश में उड राजा के बाग में उतर मङ्गल शिला-पट पर सोने की प्रतिमा की तरह बैठे। पोतली नगर वासी एक ब्राह्मण-माणवक उद्यान में जा बोधिसत्त्व को देख प्रणाम करके बैठा। बोधिसत्त्व ने उससे बातचीत कर पूछा—माणवक ! क्या राजा धार्मिक हैं ? “भन्ते ! हाँ राजा धार्मिक हैं। लेकिन उसकी भार्या मर गई हैं। वह उसके शरीर को द्रोणी मे रखवा रोता पीटता लेटा है। आज उसे सातवाँ दिन हो गया। तुम राजा को इस प्रकार के दुख से क्यो मुक्त नही करते ? क्या यह ठीक है कि तुम्हारे जैसे शीलवान् के रहते राजा इस प्रकार का दुख अनु- भव करे ?” 'माणवक ! में राजा को नही जानता। लेकिन यदि वह आकर मुझे पूछे तो मैं उसे उसकी भार्या का जन्म ग्रहण करने का स्थान बताकर, राजा के सामने ही उससे बातचीत करवाऊँ।" “भन्ते ! तो में जब तक राजा को लेकर आऊँ तब तक आप यही बैठें।" माणवक ने बोधिसत्त्व से बचन ले राजा के पास जा यह बात सुनाकर कहा—उस दिव्य-चक्षुधारी के पास चलना चाहिए। राजा यह सोच कि उब्बरी को देख सकूँगा सन्तुष्ट हो रथ पर चढ वहाँ गया। बोधिसत्त्व को प्रणाम कर उसने पूछा—क्या तुम सचमुच देवी के जन्म ग्रहण करने की जगह जानते हो ? “महाराज ! हाँ।” “वह कहाँ पैदा हुई हैं ?” “महाराज ! उसने रूप मे मत्त होने के कारण, प्रमादवश कोई अच्छा