जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context३२८ [ २.६.२०७ काम नहीं किया। इसलिए वह इसी उद्यान में गोबर के कीड़े की योनि में पैदा हुई।" “मैं विश्वास नहीं करता।” “तो तुझे दिखा कर उससे कहलवाता हूँ।” “अच्छा, कहलवाएँ।” बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से ऐसा किया कि दो गोबर-पिण्ड लुढ़कते हुए राजा के सामने आएँ। वे चले आए। बोधिसत्त्व ने उसे दिखाते हुए कहा— महाराज ! यह तेरी उब्ब्री देवी तुझे छोड़ गोबर के कीड़े के पीछे पीछे आती है। उसे देखें। “भन्ते ! मैं विश्वास नहीं करता कि उम्बरी गोबर के कीड़े की योनि में जन्म ग्रहण करेगी।” “महाराज ! उससे कहलवाता हूँ।” “भन्ते ! कहलवाएँ।” बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से उसे बुलवाते हुए पूछा—उब्ब्री ! उसने मानुषी वाणी में कहा—हाँ भन्ते ! क्या ? “पूर्व-जन्म में तेरा क्या नाम था ?” “भन्ते ! मैं अस्सक राजा की उब्ब्री नाम की पटरानी थी।” “इस समय तुझे अस्सक राजा प्रिय हैं या गोबर का कीड़ा।” “भन्ते ! वह मेरा पूर्व-जन्म था; उस समय मैं उसके साथ इस बाग़ में रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श का आनन्द लेती हुई विचरती थी। लेकिन अब जब से मेरा नया जन्म हुआ है, वह मेरा क्या लगता है ? मैं अब अस्सक राजा को मार कर उसकी गर्दन के खून से अपने स्वामी गोबर के कीड़े के पैरों को धो सकती हूँ।” यह कह परिषद् के बीच में आदमियों की भाषा में उसने यह गाथाएँ कही— अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया, अनुकामनुकामेन पियेन पतिना सह ॥ नवेन, सुखदुक्खेन, पोरणं, अपिथीयति., तस्मा अस्सकरञ्ञाव कीटो पियतरो ममं ॥