जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गूह का कीडा ठिगना था। हाथी वह भिक्षु था। उस बात को प्रत्यक्ष देखने वाला, उस वन-खण्ड मे रहने वाला देवता मै ही था।
२२८. कामनीत जातक
“तयो गिरि... "यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कामनीत ब्राह्मण के बारे मे कही। वर्तमान कथा तथा अतीत-कथा बारहवें परिच्छेद की कामजातक' में आएगी। उन दोनो राजपुत्रो में ज्येष्ठ भाई वाराणसी का राजा हुआ। छोटा भाई उपराजा। राजा की कामभोगो से तृप्ति न होती थी। वह धन का लालची था। तब बोधिसत्त्व शक्र देवेन्द्र राजा था। उसने जम्बूद्वीप पर नजर डालते हुए उस राजा को दोनो प्रकार के भोगा मे अतृप्त जान उसका निग्रह कर उसे लज्जित करने के उद्देश्य से ब्राह्मण-ब्रह्मचारी का रूप बना आकर राजा को देखा। राजा ने पूछा- “ब्रह्मचारी ! किस मतलब से आये ?" "महाराज ! मुझे तीन नगर ऐसे दिखाई देते है जो शान्त हैं, धनधान्य से पूर्ण है, जहाँ हाथी, घोडे, रथ और पैदल बहुत है, तथा जो हिरण्य, स्वर्ण के अलङ्कारो से भरे हैं। उन नगरा को थोडी ही सेना से जीता जा सकता है। मैं तुम्हें वे नगर जीत कर देने के लिए आया हूँ।" “ब्रह्मचारी ! कब चलेंगे।"
'कामजातक (४६७)