भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गूथपाणक ] ३६३ ने उसे देख सोचा—यह मेरे भय से ही भागा जा रहा है। मेरा इसका युद्ध होना चाहिए। उसने उसे ललकारते हुए पहली गाथा कही— सूरो सूरेन सङ्कम्म विक्कन्तेन पहारिना, एहि नाग निवत्तस्सु किम्मु भीतो पलायसि; पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कमं ॥ [ तू शूर है। लडने मे, प्रहार करने मे समर्थ शूर के सम्मुख होने पर हे नाग ! रुक, डर कर भाग क्यो रहा है। जरा अङ्गमगध के लोग मेरा और तेरा पराक्रम देखे । ] तू सूरो मुझ सूरेन साथ आकर वीर्य्य-विक्रम से विक्कन्तेन प्रहार करने की सामर्थ्य होने से पहारिना किस कारण से बिना लडे ही जाता है। एक प्रहार तो देने दे। इसलिए एहि नाग निवत्तस्सु इतने से ही मरने से भयभीत हो किम्मु भीतो पलायसि । यह इस सीमा मे रहने वाले पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कम हम दोनो का पराक्रम देखे। उस हाथी ने ध्यान देकर उसकी बात सुन, रुक कर उसने पास जा उसे अप्रसन्न करते हुए दूसरी गाथा कही— न त पादा वधिस्सामि न दन्तेहि न सोण्डिया, मिळ्हेन त वधिस्सामि पूति हञ्जतु पूतिना ॥ [ न तुझे पांव से मारूँगा, न दांतो से, न सूण्ड से । तुझे गूह से मारूँगा । गन्दगी गन्दगी से ही मरे । ] तुझे पांव आदि से नही मारूँगा। तेरे योग्य गूह से ही तुझे मारूँगा। ऐसा कह 'गन्दगी मे रहने वाला कीडा गन्दगी से ही मरे' (करके) उसके सिर पर बडा सा लेण्डा गिरा कर जल छोड उसे वही मार क्रौञ्चनाद करता हुआ आरण्य मे गया।