जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context४२२ [ २.६.२३७ को नु खो भगवा हेतु एकच्चं इध पुग्गले, अतीव हृदयं निब्बाति चित्तञ्चापि पसीदति ॥ [ भगवान् ! इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी के प्रति हृदय अति ठण्डा हो जाता है और चित्त प्रसन्न हो जाता है । ] अर्थ—इसका क्या कारण है कि किसी किसी आदमी को देखते ही हृदय अति ठण्डा हो जाता है, सुगन्धित शीतल जल के हजारो घड़ो से सींचे हुए की तरह शीतल हो जाता है; किसी के प्रति नही होता ? किसी को देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता है, कोमल पड जाता है, प्रेम से जुड जाता है, किसीसे नही जुडता ? शास्ता ने उन्हें प्रेम का कारण बताते हुए दूसरी गाथा कही— पुब्बेव सन्निवासेन पच्चुप्पन्नहितेन वा, एव तं जायते पेमं उप्पलंव यथोदके ॥ [ पूर्व जन्म के सम्बन्ध से वा इस जन्म के उपकार से प्रेम पैदा होता है जैसे जल में कमल । ] भिक्षुओ, प्रेम इन दो कारणो से ही पैदा होता है। पूर्व जन्म में चाहे माता, चाहे पिता, चाहे पुत्री, चाहे पुत्र, चाहे भाई, चाहे बहिन, चाहे पति, चाहे भार्या, चाहे सहायक, चाहे मित्र होकर जो कोई जिस किसी के साथ एक स्थान मे रहता है उससे इस पुब्बेव सन्निवासेन वा दूसरे जन्म में भी वह स्नेह नही छूटता । इस जन्म मे किए गए पच्चुप्पन्नहितेन वा एवं तं जायते पेमं । इन दो कारणो से प्रेम पैदा होता है। जैसे क्या ? उप्पलंव यथोदके 'व' का ह्रस्व कर दिया। समुच्चय अर्थ मे ही इस का प्रयोग है। इसलिए उत्पल तथा जल मे पैदा होने वाले शेष जितने भी पुष्प है ये दो ही कारणो से पैदा होते हैं—जल से और गारे से। उसी प्रकार इन दो ही कारणो से प्रेम पैदा होता है।