जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in context। एकपद ] ४२३ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के ब्राह्मण और ब्राह्मणी यही दो जन थे। पुत्र तो मैं ही था। २३८. एकपद जातक "इङ्ग एकपदं तात . " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक कौटुम्बिक के बारे में कही। क. वर्तमान-कथा यह कौटुम्बिक श्रावस्ती निवासी था। एक दिन गोद में बैठे हुए पुत्र ने अर्थ का द्वार नामक प्रश्न पूछा। उसने सोचा यह प्रश्न बुद्ध का ही विषय है। इसका उत्तर अन्य कोई नहीं दे सकेगा। वह पुत्र को लेकर जेतवन गया और शास्ता को प्रणाम करके कहा—भन्ते ! इस बालक ने गोद में बैठे बैठे अर्थ का द्वार प्रश्न पूछा है। मैं उसको नहीं जानता था। इसलिए यहाँ आया हूँ। भन्ते ! इस प्रश्न को कहें। शास्ता ने कहा—"उपासक ! यह बालक केवल अभी अर्थ की खोज करने वाला नहीं है। इसने पहले भी अर्थ-खोजी होकर पण्डितों से यह प्रश्न पूछा है। पुराने पण्डितों ने इसे यह कहा भी है। किन्तु जन्मान्तर की बात होने से अब इसे उसका ध्यान नहीं।" इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने सेठ के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का स्थान