जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
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Read in contextहरितमात ] ४२५ वीर्य से युक्त हो, आचार-शील तथा क्षमा से युक्त हो और मित्रो को सुख देने तथा शत्रुओं को दुख देने में समर्थ न हो ? इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पुत्र के प्रश्न का उत्तर दिया। वह भी पिता के कथनानुसार अपनी उन्नति कर यथाकर्म परलोक गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त मे पिता पुत्र सोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित हुए। उस समय पुत्र यही था। बाराणसी सेठ तो मैं ही था। २३६. हरितमात जातक “आसिविस मम सन्त ” यह शास्ता ने वेळुवन म रहते समय अजातशत्रु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशलराज के पिता महाकोशल ने राजा बिम्बिसार को अपनी लडकी देने के समय लडकी का स्नान-मूल्य काशीगांव दिया। अजातशत्रु द्वारा पिता मार दिए जाने से वह राजा के प्रति स्नेह होने के कारण शीघ्र ही मर गई। माता के मर जाने पर भी अजातशत्रु उस गांव का उपभोग करता ही था। कोशलराज उससे लडता था कि मैं पिता की हत्या करने वाले चोर को अपने कुल का गांव न दूंगा। कभी मामा विजयी होता, कभी भानजा। जब अजातशत्रु जीतता तब रथ पर ध्वजा बँधवा बडी शान के साथ नगर मे प्रवेश करता। जब पराजित होता तब दुखी मन से चुपचाप बिना किसी को खबर किए प्रवेश करता।