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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

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४२६ [ २६२ ] ६ एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो, अजात- शत्रु मामा को हराकर प्रसन्न होता है, हारने पर चिन्तित होता है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, केवल अभी नहीं, यह पहले भी जीतने पर प्रसन्न होता था, हारने पर दुखी होता था।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व नीले मेण्डक होकर पैदा हुए। उस समय मनुष्यों ने नदी कन्दरा आदि में जहाँ तहाँ मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल¹ फैलाए थे। एक जाल में बहुत सी मछ्- लियाँ दाखिल हुईं। एक जल-सर्प भी मछलियाँ खाता हुआ उसी जाल में फँसा। बहुत सी मछलियो ने इकट्ठे हो उसे खा लहू-लहान कर दिया। जब उसे कही शरण न दिखाई दी तो मृत्यु से भयभीत हो वह जाल से निकल वेदना से बेहोश हो पानी के किनारे जा पडा। नील मेण्डक भी उस समय उछल कर जाल के सिरे पर आ पडा था। सर्प को कोई दूसरा निर्णायक न दिखाई दिया तो उसने उस मेण्डक को वहाँ पड़े देख पूछा—'सौम्य नील मेण्डक ! क्या तुझे इन मछलियो की यह करतूत अच्छी लगती है ?' उसने यह पहली गाथा कही— आसीविसं ममं सन्तं पविट्ठं कुभिनामुखं, रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका ॥ [ हे हरी माता वाले ! यह जो जाल में दाखिल होने पर मुझ सर्प को मछलियाँ खाती हैं, क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ] आसिविसं ममं सन्तं मुझ सर्प को। रुच्चते हरितामाता यं मं खादन्ति मच्छका कहता है कि हे हरे मेण्डकपुत्र क्या यह तुझे अच्छा लगता है ? ¹मछलियाँ पकड़ने का बाँस का फंदा।