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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 188 of 332

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Page 188

१८४ ज्ञानयोग

प्रश्न पूछा गया है त्योंही उत्तर भी मिला है, एवं जितना ही समय बीतता जायगा वह उतना ही महत्वपूर्ण बनता जायगा। वास्तव मे हजारों वर्ष पहले ही उस प्रश्न का निश्चित उत्तर दिया गया था और परवर्ती काल मे वही उत्तर फिर से दुहराया गया व हमारी बुद्धि मे उसका पूर्ण विकास होता गया। अतएव हमे केवल उस उत्तर को फिर से एक बार दुहरा देना है। इन समस्याओं को हम एक नये रूप से जांच करने की कोशिश नहीं करेगे; हम चाहते है कि वर्तमान युग की भाषा मे हम उस सनातन महान सत्य को प्रकाशित करे, प्राचीन की चिन्ता हम नवीनों की भाषा मे व्यक्त करे। दार्शनिकों की चिन्ता हम लौकिक भाषा मे कहेगे—देवताओं की चिन्ता को हम मनुष्यो की भाषा मे प्रकट करेगे, ईश्वर संबंधी चिन्ताएँ मानव की दुर्बल भाषा मे कहते जायेगे ताकि सब उसे समझ सके। क्योकि हम बाद मे देखेगे कि जिस ईश्वरीय सत्ता से ये सब भाव प्रसूत हुए है वह मानवों मे भी वर्तमान है — जिस सत्ता ने इन चिन्ताओं की सृष्टि की है, मानव मे स्वय वह प्रकट होकर स्वय ही इन्हे समझ सकेगी।

मैं तुम लोगों को देख पा रहा हूँ। इस दर्शनक्रिया के लिये कितनी चीजो की ज़रूरत होती है ? पहले तो आँखों की आवश्यकता हम अनुभव करते है—आँखे अवश्य ही रहनी चाहिये। मेरी अन्यान्य इन्द्रियाँ स्वस्थ होते हुए भी यदि मेरी आँखे न हों तो मै तुम लोगो को नहीं देख सकूँगा। अतएव पहले आँखे अवश्य ही रहनी चाहिये। दूसरी बात यह है, आँखों के पीछे और कुछ रहने की आवश्यकता होती है जिसे हम प्रकृत रूप से दर्शनेन्द्रिय कह सकते है। यदि हममें यह न हो तो दर्शनक्रिया असम्भव है। वस्तुतः आँखे कोई