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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 189 of 332

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जगत् १८५

इन्द्रिय नहीं है, वे दर्शन करने के यंत्र मात्र ही है। यथार्थ इंद्रिय जो चक्षु के पीछे है, मस्तिष्क के स्नायुकेन्द्र में अवस्थित है। यदि वह केन्द्र किसी प्रकार नष्ट हो जाय तो स्वच्छ चक्षुद्वय रहते हुए भी मनुष्य कुछ नहीं देख सकेगा। अतएव दर्शनक्रिया के लिये उस प्रकृत इन्द्रिय का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। हमारी अन्यान्य इन्द्रियों के वारे मे यही एक बात कही जा सकती है। वाहर के कान केवल आवाज को भीतर लेजाने के यत्र है। वह आवाज़ मस्तिष्क मे अवस्थित केन्द्र मे जा पहुँचती है, किन्तु इससे श्रवणक्रिया पूर्ण नही होती। कभी कभी ऐसा भी होता है कि पुस्तकालय में बैठकर तुम ध्यान से कोई पुस्तक पढ़ रहे हो, घड़ी मे बारह बजने की आवाज होती है, किन्तु तुम्हे कुछ सुनाई नही देता। क्यों तुम कुछ नहीं सुन पाए ? यहाँ किस चीज़ की कमी थी ? उस इन्द्रिय के साथ मन का कोई योग नहीं था। अतएव हम देख रहे हैं कि मन का रहना भी नितान्त आवश्यक है। प्रथमतः बहिर्यन्त्र, उसके बाद यह बहिर्यन्त्र मानो किसी विषय को वहन कर इन्द्रिय के निकट ले जाता है, फिर उस इन्द्रिय के साथ मन युक्त रहना चाहिये। जब मस्तिष्क मे अवस्थित उस इन्द्रिय का मन से कोई योग नहीं रहता है तब कर्ण-यन्त्र तथा मस्तिष्क के केन्द्र पर किसी भी विषय का प्रभाव पड़ सकता है किन्तु हमे कोई अनुभव नहीं होगा। मन भी केवल वाहक है, उसे इस विषय का प्रभाव और भी भीतर वहन कर बुद्धि को प्रदान करना पड़ता है। अब बुद्धि को उसका निश्चय करना पडता है, परन्तु इससे भी पर्याप्त फल नहीं होता। बुद्धि को उसे फिर और भी भीतर ले जाकर शरीर के राजा आत्मा के पास पहुँचाना पड़ता है। उनके पास पहुँचने पर वे आदेश देते हैं कि "हाँ यह

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