Skip to content
BharatKosha
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

Page 190 of 332

Read in context
Page 190

१८६ ज्ञानयोग

करो ” या “ यह न करो ” । तब जिस क्रम के अनुसार वह भीतर गया था ठीक उसी क्रम से वह बहिर्यन्त्र मे आता है—पहिले बुद्धि मे, उसके बाद मन मे, फिर मस्तिष्क-केन्द्र में, अन्त मे बहिर्यन्त्र मे; तभी विषय का ज्ञान सम्पन्न होता है।

इन सब यन्त्रों का अवस्थान मनुष्य की स्थूल देह मे है, लेकिन मन तथा बुद्धि का कोई दूसरा निवास है। हिन्दू शास्त्र मे उसका नाम है सूक्ष्म शरीर, ईसाई शास्त्र मे वह आध्यात्मिक शरीर है। इस शरीर से वह बहुत ही सूक्ष्म है, परन्तु फिर भी उसे आत्मा नही कहा जा सकता। आत्मा इन सबों के अतीत है। कुछ दिनो मे स्थूल शरीर का अन्त हो जाता है, किसी मामूली कारण से ही उसके भीतर गड़बड़ी पैदा हो जाती है और वह नष्ट हो जा सकता है। इतनी आसानी से सूक्ष्म शरीर नष्ट नहीं होता, किन्तु उसे भी कभी कभी कमज़ोरी आ जाती है। हम देखते है कि बूढ़े लोगों मे मन का उतना ज़ोर नही रहता है, फिर शरीर मे बल रहने से मन की शक्ति भी कायम रहती है—विविध औषधियाँ मन पर अपना प्रभाव डालती है। बाहर की सब वस्तुएँ उस पर अपना प्रभाव डालती है, और वह भी बाह्य जगत पर अपना प्रभाव डालता है। जैसे शरीर में उन्नति और अवनति होती है वैसे ही मन भी कभी कभी सबल और निर्बल हो जाता है, अतएव मन कभी आत्मा नही हो सकता, क्योंकि आत्मा अविमिश्रित तथा क्षयरहित होता है। हम कैसे यह जान सकते हैं? क्योकर हम जान सकते हैं कि मन के पीछे और भी कुछ है? स्वप्रकाश ( Self luminous ) ज्ञान कभी जड का धर्म नहीं हो सकता है। ऐसी कोई जड वस्तु नही दिखाई देती जिसका निजी रूप ही ज्ञान है। जड भूत कभी स्वय

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद) · Page 190 of 332 · BharatKosha