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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages
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ब्रह्म और जगत् १५१

काल भी दो घटनाओं पर निर्भर रहता है। और 'निमित्त' अथवा 'कार्यकारण भाव' की धारणा इन देश और काल के ऊपर निर्भर रहती है। 'देश-काल-निमित्त' इन सब के भीतर विशेषत्व यही है कि इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस कुर्सी अथवा उस दीवार का जैसा अस्तित्व है उनका वैसा भी नहीं है। वे जैसे सभी वस्तुओं के पीछे लगी हुई छाया के समान है, आप किसी प्रकार भी उन्हें पकड़ नहीं सकते। उनकी तो कोई सत्ता नहीं है—हम देख चुके हैं कि उनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है—अधिक से अधिक वे छाया के समान है। और, वे कुछ भी नहीं है यह भी नहीं कहा जा सकता; कारण, उन्हीं के द्वारा जगत् का प्रकाश हो रहा है—ये तीनो मानो स्वभावतः ही मिल कर नाना रूपों की उत्पत्ति कर रहे हैं। अतएव पहले हमने देखा कि इन देश-काल-निमित्त की समष्टि का अस्तित्व भी नहीं है और वे बिलकुल असत् (अस्तित्व शून्य) भी नहीं है। दूसरे, ये कभी कभी बिलकुल ही अन्तर्हित हो जाते हैं। उदाहरण स्वरूप समुद्र की तरंगों को लीजिये। तरंग अवश्य ही समुद्र के साथ अभिन्न है तथापि हम उसको तरंग कहकर समुद्र से पृथक रूप मे जानते हैं। इस विभिन्नता का कारण क्या है—नाम रूप। नाम अर्थात् उस वस्तु के सम्बन्ध मे हमारे मन मे जो एक धारणा रहती है; और रूप अर्थात् आकार। फिर क्या तरंग को समुद्र से बिलकुल पृथक रूप मे हम सोच सकते हैं? कभी नहीं। वह सदा ही इसी समुद्र की धारणा के ऊपर निर्भर रहती है। यदि यह तरंग चली जाय, तो रूप भी अन्तर्हित हो गया, किन्तु यह रूप बिलकुल ही भ्रमात्मक था, यह बात नहीं। जब तक यह तरंग थी तब तक यह रूप था और आप को बाध्य होकर यह

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रूप देखना पडता था—यही माया है। अतएव यह समुदाय जगत् उसी ब्रह्म का एक विशेष रूप है। ब्रह्म ही वह समुद्र है और तुम और मै, सूर्य, तारे सभी उस समुद्र मे विभिन्न तरंग मात्र है। तरंगों को समुद्र से पृथक कौन करता है? वही रूप; और वह रूप है केवल देश-काल-निमित्त। ये देश-काल-निमित्त भी सम्पूर्ण रूप से इन तरंगो के ऊपर निर्भर रहते है। तरंगें जैसे ही चली जाती है वैसे ही ये भी अन्तर्हित हो जाते हैं। जीवात्मा ज्योंही इस माया का परित्याग कर देता है उसी समय उसके लिये वह, अन्तर्हित हो जाती है और वह मुक्त हो जाता है। हमारी सभी चेष्टाये इन देश-काल-निमित्त के अतीत होने के लिये होनी चाहियं। वे सदा ही हमारी उन्नति के मार्ग में बाधा डाल रहे हैं और हम सदा ही उनका ग्रास बनने से अपने को बचा रहे हैं। विद्वान लोग क्रमविकासवाद (Theory of Evolution) किसको कहते हैं? इसके भीतर दो बाते है। एक तो यह कि एक प्रबल अन्तर्निहित गूढ शक्ति अपने को प्रकाशित करने की चेष्टा कर रही है और बाहर की अनेक घटनाये उसमे बाधा पहुँचाती है—आस पास की परिस्थितियाँ उसको प्रकाशित नहीं होने दे रही हैं। अतः इन परिस्थितियों से युद्ध करने के लिये यह शक्ति नये नये शरीर धारण कर रही है। एक क्षुद्रतम कीटाणु उन्नत होने की चेष्टा मे एक और शरीर धारण करता है एव कितनी ही बाधाओं को पराजित करके रहता है, और इसी प्रकार भिन्न भिन्न शरीर धारण करते हुए अन्त में मनुष्य रूप में परिणत हो जाता है। अब यदि इसी तत्व को उसके स्वाभाविक चरम सिद्धान्त पर ले जाया जाय तो यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि ऐसा समय आयेगा जब

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कि जो शक्ति कीटाणु के भीतर क्रीडा कर रही थी और जो अन्त में मनुष्य के रूप में परिणत हो गई वह सभी बाधाओ को अतिक्रमण करेगी, बाहर की घटनाये उसको फिर बाधा नहीं पहुँचा पायेगी। इसी बात को दार्शनिक भाषा मे इस प्रकार कहना होगा—प्रत्येक कार्य के दो अश होते हैं; एक विषयी, दूसरा विषय। एक व्यक्ति ने मेरा तिरस्कार किया, मैंने अपने को दुःखी अनुभव किया—यहाँ भी ये ही दो बाते है, और हमारे सारे जीवन की चेष्टा क्या है? यही न कि अपने मन को इतनी दूर तक सरल कर लेना कि जिससे बाहर की परिस्थितियों पर हम अपना आधिपत्य कर सके, अर्थात् उनके द्वारा हमारा तिरस्कार होने पर भी हम किसी कष्ट का अनुभव न करें। इसी प्रकार हम प्रकृति को पराजित करने की चेष्टा कर रहे है। नीति का अर्थ क्या है? ‘अपने’ को दृढ करना—उसे क्रमशः सभी प्रकार की परिस्थितियों को सहन कराना, जैसे आपका विज्ञान कहता है कि कुछ समय के बाद मनुष्य-शरीर सभी अवस्थाओ को सहन करने में समर्थ होगा, और यदि विज्ञान की यह बात सत्य हो तो हमारे दर्शन का यही सिद्धान्त (अर्थात् एक ऐसा समय आयेगा जब हम सभी परिस्थितियों के ऊपर विजय प्राप्त कर सकेगे) अकाट्य युक्ति पर स्थापित हो गया, यही कहना पड़ेगा; कारण, प्रकृति सीमित है।

यह बात भी अब समझनी होगी कि प्रकृति ससीम है। ‘प्रकृति ससीम है,’ कैसे जाना? दर्शन के द्वारा यह जाना जाता है कि प्रकृति उस अनन्त का ही सीमाबद्ध भाव मात्र है। अतएव वह सीमित है। अतएव एक समय ऐसा आयेगा जब हम बाहर की परि-

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स्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकेगे। उनको पराजित करने का उपाय क्या है ? वास्तव मे तो हम बाहर के विषयों में परिवर्तन उत्पन्न करके उनके ऊपर विजय प्राप्त कर नहीं पाते। छोटी सी मछली जल मे रहने वाले अपने शत्रुओं से अपनी रक्षा करना चाहती है। किस प्रकार वह इस कार्य को करती है ? आकाश मे उड़ कर, पक्षी बन कर। मछली ने जल अथवा वायु में कोई परिवर्तन नहीं किया—जो कुछ भी परिवर्तन हुआ वह उसके अपने अन्दर ही हुआ। परिवर्तन सदा 'अपने' अन्दर ही होता है। इसी प्रकार हम देखते है कि समस्त क्रमविकास मे परिवर्तन 'अपने' अन्दर ही होते होते, प्रकृति पर विजय प्राप्त हो रही है। इसी तत्व का धर्म और नीति में प्रयोग करो तो देखोगे कि यहाँ भी 'अशुभजय' 'अपने' भीतर परिवर्तन के द्वारा ही साधित हो रही है। सभी कुछ 'अपने' ऊपर निर्भर रहता है। यह 'अपने' के ऊपर ज़ोर डालना ही अद्वैतवाद की वास्तविक दृढ भूमि है। 'अशुभ, दुःख' यह सब बात कहना ही भूल है, कारण, बहिर्जगत् मे इनका कोई अस्तित्व नहीं है। क्रोध के कारणों के बार बार होने पर भी इन सब घटनाओं मे स्थिर भाव से रहने का यदि हमे अभ्यास होजाय, तो हमारे अन्दर क्रोध का उद्रेक कभी नहीं होगा। इसी प्रकार लोग मुझसे चाहे कितनी ही घृणा करे, यदि मै उसका अपने ऊपर प्रभाव नहीं लेता, तो मेरा भी उनके प्रति घृणाभाव उत्पन्न नहीं होगा। इसी प्रकार 'अशुभजय' करना पड़ता है—'अपनी' उन्नति का साधन करके। अतएव आप देखते है कि अद्वैतवाद ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो आधुनिक वैज्ञानिकों के सिद्धान्तों के साथ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशाओं मे मिल जाता है, इतना ही

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नही वरन् इन सभी सिद्धान्तो से भी उच्चतर सिद्धान्तो को स्थापित करता है और इसी कारण से यह आधुनिक वैज्ञानिको को बहुत भाता है। वे देखते है कि प्राचीन द्वैतवादी धर्म उनके लिये पर्याप्त नहीं है, उनसे उनकी ज्ञान की भूख नहीं मिटती। किन्तु इस अद्वैतवाद मे उनके ज्ञान की भूख मिटती है। केवल दृढ़ विश्वास रहने से ही मनुष्य का काम नहीं चलेगा, ऐसा विश्वास होना चाहिये जिससे उसकी ज्ञानवृद्धि चरितार्थ हो। यदि मनुष्य से जो कुछ वह देखे उसी पर विश्वास करने को कहा जाय तो वह शीघ्र ही पागलखाने मे चला जायगा। एक बार एक महिला ने मेरे पास एक पुस्तक भेजी—उसमे लिखा था, सभी बातों पर विश्वास करना उचित है। उसमे यह भी लिखा था कि मनुष्य की आत्मा अथवा इस प्रकार की अन्य किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु स्वर्ग मे देव-देवियाँ हैं और एक प्रकाश का सूत्र हममे से प्रत्येक के मस्तक के साथ स्वर्ग का संयोग कर रहा है। लेखिका को इन सब बातो का पता कैसे लगा? उन्होने प्रत्यादिष्ट होकर इन सब तत्वो को जाना था और उन्होने मुझसे भी इनपर विश्वास करने को कहा था। जब मैंने उनकी इन सब बातो पर विश्वास करना अस्वीकार कर दिया तब उन्होने कहा—"तुम अवश्य ही बड़े दुराचारी हो—तुम्हारे लिये अब कोई आशा नहीं है।" जो भी हो, इस उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग मे भी हमारे बाप-दादा से आया हुआ धर्म ही एक मात्र सत्य है, अन्य जिस किसी स्थान मे जिस-किसी भी धर्म का प्रचार हो रहा है वह अवश्य ही मिथ्या है—इस प्रकार की धारणा अनेक स्थानो मे है। इससे प्रमाणित होता है कि हमारे भीतर अभी भी अनेक दुर्बलताये है—ये दुर्बलताये दूर करनी होंगी।

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मै यह नही कहता कि यह दुर्बलता केवल इसी देश में (इंग्लैण्ड में) हैं—यह सभी देशों मे है और जैसी मेरे देश में है वैसी तो कहीं भी नहीं है—और यह बहुत-ही भयानक रूप मे है। इसीलिये अद्वैतवाद का प्रचार साधारण लोगों में कभी होने नहीं दिया गया। संन्यासी लोग अरण्य (वन) मे इसकी साधना करते थे, इसी कारण वेदान्त का एक नाम 'आरण्यक' भी था। अन्त मे भगवान की कृपा से बुद्ध देव ने आकर सर्व साधारण लोगों के बीच इसका प्रचार किया, उस समय समस्त जाति बौद्ध धर्म से जाग उठी। बहुत समय के बाद जब नास्तिकों ने समस्त जाति को ध्वंस करने की फिर चेष्टा की तब ज्ञानियों ने समझा कि भारत की नास्तिकता के अन्धकार को दूर करने के लिये एक मात्र उपाय यही धर्म है। दो बार इसने नास्तिकता से भारत की रक्षा की है। पहले, बुद्धदेव के आने से पूर्व नास्तिकता अति प्रवल हो उठी थी—योरोप अमेरिका के विद्वानो मे आजकल जैसी नास्तिकता है वैसी नहीं; वह इससे भी भयंकर नास्तिकता थी। मैं एक प्रकार का नास्तिक हूँ, कारण मेरा विश्वास है कि केवल पदार्थ का ही अस्तित्व है। आधुनिक वैज्ञानिक नास्तिक भी यही कहते है, किन्तु वे उसे 'जड़' नाम से पुकारते है और मैं उसे 'ब्रह्म' कहता हूँ। ये 'जड़वादी' नास्तिक कहते है, इसी 'जड़' से ही मनुष्य की आशा, भरोसा, धर्म सभी कुछ हैं। मै कहता हूँ, 'ब्रह्म' से ही सब कुछ हुआ है। मैं इस प्रकार की नास्तिकता की बात नहीं कह रहा हूँ, मै चार्वाको के मत की बात कह रहा हूँ—खाओ, पिओ, मौज उड़ाओ; ईश्वर, आत्मा या स्वर्ग कुछ भी नही है, धर्म कुछ धूर्त दुष्ट पुरोहितो की कल्पना मात्र है—यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।' इस प्रकार की नास्तिकता बुद्धदेव

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के आविर्भाव के पूर्व इतनी बढ़ गई थी कि उसका एक नाम हो गया ‘लोकायत दर्शन’। इस प्रकार की अवस्था में बुद्धदेव ने आकर साधारण लोगों मे वेदान्त का प्रचार करके भारतवर्ष की रक्षा की। बुद्धदेव के तिरोधान के ठीक एक हजार वर्ष पश्चात् फिर इसी प्रकार की बात हुई। चण्डाल भी बौद्ध होने लगे। नानाविध विभिन्न जातियाँ बौद्ध होने लगीं। अनेक लोग अति नीच जाति के होते हुये भी बौद्ध धर्म ग्रहण करके बड़े सदाचारी बन गये। किन्तु इनमे नाना प्रकार के कुसंस्कार थे—नाना प्रकार के टोने टोटके, मंत्र तंत्र और भूत-देवताओं मे विश्वास था। बौद्ध धर्म के प्रभाव से ये बातें कुछ दिनो तक अवश्य दबी रहीं। किन्तु वे फिर प्रकट हो पड़ीं। अन्त में भारतवर्ष के बौद्ध धर्म में नाना प्रकार के विषयों की खिचड़ी हो गई। उस समय फिर से नास्तिकता के बादलों से भारत का आकाश ढक गया—अच्छे परिवार के लोग स्वेच्छाचारी और साधारण लोग कुसंस्कारी हो गये। ऐसे समय मे शंकराचार्य ने उठ कर फिर से वेदान्त की ज्योति को जगाया। उन्होने उसका एक युक्ति-संगत विचारपूर्ण दर्शन के रूप मे प्रचार किया। उपनिषदों मे विचार-भाग बड़ा ही अस्फुट है। बुद्धदेव ने उपनिषदों के नीति-भाग के ऊपर खूब ज़ोर दिया था, शंकराचार्य ने उनके ज्ञान-भाग के ऊपर अधिक ज़ोर दिया। उनके द्वारा उपनिषदों के सिद्धान्त युक्ति और विचार के द्वारा प्रमाणित और प्रणालीबद्ध रूप मे लोगों के समक्ष स्थापित हुए हैं। योरोप मे भी आजकल ठीक वही अवस्था उपस्थित है। इन नास्तिकों की मुक्ति के लिये—वे जिस-से विश्वास करे इसके लिये—आप सारे संसार को इकट्ठा करके प्रार्थना करे किन्तु वे विश्वास नहीं करेंगे; वे युक्ति चाहते

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हैं। अतः योरोप की मुक्ति इस समय इसी विचार द्वारा पवित्र हुये धर्म अद्वैतवाद के,ऊपर निर्भर है; और एक मात्र यही अद्वैतवाद, यह निर्गुण ब्रह्म का भाव ही विद्वानों के ऊपर प्रभाव डाल सकता है। जब कभी धर्म लुप्त होने का उपक्रम होता है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है तभी इसका आविर्भाव होता है। इसीलिये योरोप और अमेरिका में प्रवेश प्राप्त कर यह दृढ़मूल होता जा रहा है।

इसमे केवल एक बात और जोड़ देनी होगी। प्राचीन उपनिषद बड़े उच्च कवित्व से पूर्ण हैं। उपनिषदों के वक्ता ऋषि लोग महाकवि थे। आपको अवश्य ही याद होगा कि प्लेटो ने कहा है—कवित्व के द्वारा भी जगत् मे अलौकिक सत्य का प्रकाश होता है। मानों कवित्व द्वारा उच्चतम सत्यों को जगत् को देने के लिये विधाता ने साधारण मनुष्यो से बहुत ऊँची पदवी पर आरूढ़ कवियों के रूप मे उपनिषदों के ऋषियों की सृष्टि की थी। वे प्रचार भी नही करते थे अथवा दार्शनिक विचार भी नहीं करते थे और लिखते भी नही थे। उनके हृदय के झरने से संगीत का फुहारा बहता था। उसके वाद बुद्धदेव में हम देखते है—हृदय अनन्त सहनशक्ति वाला—उन्होंने धर्म को सर्व साधारणोपयोगी बना कर प्रचार किया । असाधारण धीशक्तिसम्पन्न शंकराचार्य ने उसको ज्ञान के प्रखर आलोक मे प्रकाशित किया। हमको अब चाहिये कि इस प्रखर ज्ञान-सूर्य के साथ बुद्धदेव के इस अद्भुत हृदय—इस अद्भुत प्रेम और दया को, सम्मिलित करें। अत्यन्त ऊँचे दार्शनिक भाव भी इसमे रहें, यह विचारपूत हो और साथ ही साथ इसमे उच्च हृदय, प्रबल प्रेम और

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दया का योग रहे। तभी मणि और काञ्चन का योग होगा, तभी विज्ञान और धर्म एक दूसरे को सहयोग देगे। यही भविष्य में धर्म होगा और यदि हम इसको ठीक ठीक ले सकें तो यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि यह सभी काल और अवस्थाओं के लिये उपयोगी होगा। यदि आप घर जाकर स्थिर भाव स विचार करें तो देखेगे कि सभी विज्ञानों मे कुछ न कुछ त्रुटि है। किन्तु ऐसा होने पर भी यह निश्चय जानिये कि आधुनिक विज्ञान को इसी एक मार्ग पर आना पडेगा—पड़ेगा क्यों—वह तो अभी भी इस ओर आ रहा है। जब कोई बड़ा वैज्ञानिक कहता है कि सभी कुछ उस एक शक्ति का विकास है तब क्या आपके मन मे नहीं आता कि उस समय वे उपनिषदो मे वर्णित उसी ब्रह्म की महिमा का कीर्तन करते हैं ?

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥
कठोपनिषद्, २।२।९

“जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत मे प्रविष्ट हो कर नाना रूपों में प्रकट होती है उसी प्रकार वह सब जीवों का अन्तरात्मा एक ब्रह्म नाना रूपो मे प्रकाशित हो रहा है और वह जगत के बाहर भी है।” विज्ञान किस ओर जा रहा है, क्या आप नही समझ रहे है? हिन्दू जाति मनस्तत्व की आलोचना करते करते दर्शन के द्वारा आगे बढी थी। योरोपीय जातियाँ बाह्य प्रकृति की आलोचना करते करते अग्रसर हुईं। अब दोनों एक स्थान पर पहुँच रहे हैं। मनस्तत्व के भीतर होकर हम उसी एक अनन्त सार्वभौमिक सत्ता में पहुँच रहे है-

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जो सब वस्तुओं की अन्तरात्मा स्वरूप है, जो सब का सार और सभी वस्तुओं का सत्यस्वरूप है, जो नित्यमुक्त, नित्यानंद और नित्यसत्तास्वरूप है। बाह्य विज्ञान के द्वारा भी हम उसी एक तत्त्व पर पहुँचते हैं। यह समस्त जगत्प्रपञ्च उसी एक का विकास है—वह जगत् में जो कुछ भी है उस सब का समष्टि स्वरूप है। और समग्र मानवजाति मुक्ति की ओर अग्रसर हो रही है, बन्धन की ओर वह कभी जा ही नहीं सकती। मनुष्य नीतिपरायण क्यों हो ? क्योंकि नीति ही मुक्ति का और दुर्नीति बन्धन का मार्ग है।

अद्वैतवाद का एक और विशेषत्व यह है कि अद्वैत सिद्धान्त अपने आरम्भ काल से ही अन्य धर्मों या मतों को तोड़ फोड़ कर फेंक देने की चेष्टा नहीं करता। अद्वैतवाद का एक और महत्व यह है कि यह प्रचार करना महान् साहस का कार्य है कि—

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।
जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥
— गीता, ३ । २६

“ ज्ञानी लोगों को अज्ञ अतएव कर्म में आसक्त व्यक्तियों में बुद्धिभेद उत्पन्न नही करना चाहिये, विद्वान व्यक्ति को स्वंयं युक्त रह कर उन लोगों को सब प्रकार के कर्मों में नियुक्त करना चाहिये ।”

अद्वैतवाद यही कहता है—किसी की बुद्धि को विचलित मत करो, किन्तु सभी को उच्च से उच्चतर मार्ग पर जाने में सहायता करो। अद्वैतवाद जिस ईश्वर का प्रचार करता है वह समस्त जगत

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का समष्टि स्वरूप है; यदि यह मत सत्य है तो यह अवश्य ही सब मतों को अपने विशाल उदर मे ग्रहण कर लेगा। यदि ऐसा कोई सार्वजनीन धर्म है जिसका लक्ष्य सबको ग्रहण करना हो, तो उसका केवल कुछ लोगों के ग्रहण करने योग्य ईश्वर का एक विशेष भाव से प्रचार करने से काम नहीं चलेगा, उसमें सब भावों की समष्टि होना आवश्यक है। अन्य किसी मत मे यह समष्टि का भाव उतना परिस्फुटित नही है, फिर भी वे सभी उसी समष्टि की प्राप्ति की चेष्टा कर रहे है। विशेष विशेष भावो का अस्तित्व केवल इसीलिये है कि वे सर्वदा ही समष्टि बनने की चेष्टा करते रहते है। इसीलिये अद्वैतवाद के साथ भारतवर्ष के किसी भी सम्प्रदाय का पहले से ही कोई विरोध नही था। भारत मे आजकल भी अनेक द्वैतवादी है, जिनकी संख्या भी अत्यधिक है। इसका कारण है, अशिक्षित लोगों के मन मे स्वभावतः द्वैतवाद का उदय होता है। द्वैतवादी कहते है कि यही जगत् की एक विल्कुल स्वाभाविक व्याख्या है, किन्तु इन द्वैतवादियो के साथ अद्वैत-वादियो का कोई विवाद नही है। द्वैतवादी कहते है, “ईश्वर जगत् के बाहर है, वह स्वर्ग के बीच एक विशेष स्थान मे रहता है।” अद्वैतवादी कहते है, “जगत् का ईश्वर उसका अपना ही अन्तरात्मा-स्वरूप है, उसको दूरवर्ती कहना ही नास्तिकता है। उसको स्वर्ग में अथवा अन्य किसी दूरवर्ती प्रदेश में अवस्थित किस प्रकार कहते हो? उससे पृथक होने का भाव मन मे लाना भी भयानक है! वह तो अन्यान्य सब वस्तुओं से हमारे अधिक निकट है। ‘तुम्ही वह हो’—इस एकत्व सूचक वाक्य को छोड़ किसी भी भाषा मे ऐसा कोई शब्द नहीं है जिसके द्वारा उसकी निकटता प्रकट की जा सके। जिस प्रकार द्वैतवादी अद्वैतवादियों की बातो से डरते है और उसे

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नास्तिकता कहते है, अद्वैतवादी भी उसी प्रकार द्वैतवादियों की बातों से डरते और कहते है कि मनुष्य किस प्रकार उसको (ईश्वर को) अपनी ज्ञेय वस्तु समझने का साहस करता है? ऐसा होने पर भी वे जानते है कि धर्मजगत् मे द्वैतवाद का स्थान कहाँ पर है—वे जानत है कि द्वैतवादी अपने दृष्टिकोण से ठीक ही बात कहते हैं, अतः उनसे उनका कोई विवाद नहीं। जब तक वे समष्टिभाव से न देख कर व्यष्टि भाव से देखते है तब तक उन्हे अवश्य ही ‘अनेक’ देखना पड़ेगा। व्यष्टि भाव की ओर से देखने पर उन्हे अवश्य ही भगवान को बाहर देखना पड़ेगा—ऐसा न हो, यह हो ही नही सकता। वे कहेत हैं—‘हमे अपने मत मे ही रहने दो।’ फिर भी अद्वैतवादी जानेत है कि द्वैतवादियों के मत मे चाहे कितनी ही असम्पूर्णता क्यों न हो, वे सभी उसी एक लक्ष्य की ओर जा रहे है। इसी स्थान पर उनका द्वैतवादियों के साथ पूरा मतभेद है। संसार के सभी द्वैतवादी स्वभावतः ही एक ऐसे सगुण ईश्वर मे विश्वास करते है जो एक उच्च शक्तिसम्पन्न मनुष्यमात्र है, और जिस प्रकार मनुष्य के कुछ प्रिय पात्र होते हैं, तथा कुछ अप्रिय पात्र, उसी प्रकार द्वैतवादियो के ईश्वर के भी होते है। वह बिना किसी कारण के ही किसी से तो सन्तुष्ट है, किसी से विरक्त। आप देखेगे किं सभी जातियों में ऐसे लोग कितने ही है जो कहते हैं—‘हम ईश्वर के अन्तरंग प्रिय पात्र है और कोई नहीं; यदि अनुतप्त हृदय से हमारी शरण मे आओ तभी हमारा ईश्वर तुम पर कृपा करेगा।’ और कितने ही द्वैतवादी ऐसे हैं, जिनका मत और भी भयानक है। वे कहते है—“ईश्वर जिनके प्रति दयालु है, जो उसके अन्तरंग हैं, वे पहले से ही ईश्वर द्वारा ‘निर्दिष्ट’ है—और कोई यदि माथा फोड़ कर भी मर जाय तो भी इस अन्तरग

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दल के बीच प्रवेश नहीं पा सकता।” आप मुझे ऐसा कोई भी द्वैत-वादात्मक धर्म बता दीजिये जिसके भीतर यह संकीर्णता नहीं है। इसी कारण से ये सब धर्म सदा ही परस्पर युद्ध करते रहेंगे और करते रहे है। और ये द्वैतवादी धर्म सदा ही लोकप्रिय होते हैं, क्योकि अशिक्षितों के भाव सदा ही लोकप्रिय होते है। द्वैतवादी समझते है कि एक दण्डधारी ईश्वर के बिना किसी प्रकार की नीति ठहर ही नही सकती। मानलो एक छकड़ा गाड़ी का घोड़ा व्याख्यान देना प्रारम्भ करता है। वह कहेगा—‘‘लन्दन के लोग बड़े खराब हैं; कारण वे हमें नित्यप्रति कोडे नहीं मारते।” वह स्वयं चाबुक खाने मे अभ्यस्त हो गया है। इससे अधिक वह और क्या समझ सकता है ? किन्तु वास्तव मे चाबुक की मार से लोग और भी खराब हो जाते है। गहरी चिन्ता करने मे असमर्थ लोग सभी देशो में द्वैतवादी हो जाते है। बेचारे गरीबों पर सदा ही अत्याचार होता रहा है। अतः उनकी मुक्ति की धारणा केवल इस दण्ड से मुक्ति पाना है।

दूसरी ओर हम यह भी जानते है कि सभी देशो के चिन्ताशील महापुरुषों ने इसी निर्गुण ब्रह्मभाव को लेकर ही कार्य किया है। इसी भाव से भरकर ईसामसीह ने कहा है–'मै और मेरा पिता एक है।' इसी प्रकार का व्यक्ति लाखो व्यक्तियो मे शक्तिसञ्चार करने मे समर्थ होता है। यही शक्ति सहस्रों वर्ष तक मनुष्यो के प्राणों मे शुभ परित्राण देने वाली शक्ति का संचार करती है। और हम यह भी जानते हैं कि ये महापुरुष अद्वैतवादी थे, इसीलिये दूसरों के प्रति दयाशील थे। उन्होने साधारण लोगो को ‘हमारा स्वर्गस्थ पिता’ की शिक्षा दी थी। साधारण लोग, जो सगुण ईश्वर से उच्चतर अन्य किसी भाव को धारण नहीं कर सकते थे उन्होंने उनको अपने स्वर्ग मे रहने वाले पिता से

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प्रार्थना करना सिखाया। किन्तु यह भी कहा कि 'जब समय आयेगा तो तुम देखोगे कि मैं तुम्हीं मे हूँ, और तुम मुझमें हो, जिससे तुम सभी उस पिता के साथ एक हो सकोगे जिस प्रकार मैं और मेरे पिता अभिन्न है।' बुद्धदेव देवता, ईश्वर आदि को विशेष नहीं मानते थे। साधारण लोग उनको नास्तिक कहते थे किन्तु वे एक साधारण बकरी के लिये प्राण तक देने को प्रस्तुत थे। उन्ही बुद्धदेव ने, जो नीति मनुष्य-जाति के लिये सर्वोच्च ग्रहणीय हो सकती है, उसका प्रचार किया था। जहाँ कहीं भी आप किसी प्रकार का नीति-विधान पायेंगे, वहीं देखेंगे कि उनका प्रभाव, उनका प्रकाश जगमगा रहा है। जगत् के इन सब उच्च-हृदय व्यक्तियों को आप किसी सङ्कीर्ण दायरे में बाँध कर नहीं रख सकते, विशेषतः आज, जब कि मनुष्य जाति के इतिहास मे एक ऐसा समय आ गया है और सब प्रकार के ज्ञान की ऐसी उन्नति हुई है जिसकी सौ वर्ष पूर्व स्वप्न मे भी कल्पना न थी, यहाँ तक कि पचास वर्ष पूर्व जो किसीने स्वप्न मे भी नहीं सोचा था, ऐसे सभी प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान का स्रोत बह चला है। ऐसे समय में क्या लोगो को अब भी इस प्रकार के सङ्कीर्ण भावो में आबद्ध करके रखा जा सकता है? हाँ, लोग यदि बिलकुल ही पशुतुल्य चिन्ताहीन जड़ पदार्थ के समान हो जायें तो यह सम्भव है। इस समय आवश्यकता है उच्चतम ज्ञान के साथ उच्चतम हृदय, अनन्त ज्ञान के साथ अनन्त प्रेम का योग करने की। अतएव वेदान्ती कहते है, उस अनन्त सत्ता के साथ एकीभूत होना ही एक मात्र धर्म है, और वे भगवान को केवल इतना ही बतलाते है—अनन्त सत्ता, अनन्त ज्ञान, अनन्त आनन्दः और वे कहते हैं कि ये तीनों एक है। ज्ञान और आनन्द के बिना सत्ता कभी रह ही नहीं सकती। हमे यही सम्मेलन

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ब्रह्म और जगत् १६५

चाहिये—इस अनन्त सत्ता, ज्ञान और आनन्द की चरम उन्नति—एकदेशीय उन्नति नहीं। हमे चाहिये सभी बातो की समान उन्नति। बुद्धदेव के समान महान् हृदय के साथ महान् ज्ञान का योग होना सम्भव है। मै आशा करता हूँ, हम सभी उस एक लक्ष्य पर पहुँचने की प्राणपण से चेष्टा करेंगे।


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८. जगत्

( बहिर्जगत् )

सुन्दर पुष्पराशि चारों ओर सुगन्ध फैला रही है, प्रभात का सूर्य अत्यन्त सुन्दर रक्तवर्ण होकर उदित हो रहा है। प्रकृति नाना प्रकार के विचित्र रंगो से सजकर शोभायमान हो रही है, समस्त जगत्ब्रह्माण्ड सुन्दर है, और मनुष्य जब से पृथ्वी पर आया है तभी से इसका भोग कर रहा है। पर्वतमालाये गम्भीर भावव्यंजक एवं भय उत्पन्न करनेवाली हैं, प्रबल वेग से समुद्र की ओर बहने वाली नदियाँ, पदचिन्हों से रहित मरु देश, अनन्त असीम सागर, तारो से भरा आकाश, ये सभी गम्भीर भावों से पूर्ण और भयोदीपक है—फिर भी मनोहर हैं। प्रकृति शब्द से कही जानेवाली सभी सत्ताये अति-प्राचीन, स्मृति-पथ के अतीत काल से मनुष्य के मन के ऊपर कार्य कर रही है, वे मनुष्य की विचारधारा के ऊपर क्रमशः प्रभाव बढ़ा रही है और इस प्रभाव की प्रतिक्रिया रूप मे क्रमशः मनुष्य के हृदय मे यह प्रश्न उठ रहा है कि यह सब क्या है और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ? अति प्राचीन मानव-रचना वेद के प्राचीन भाग मे भी इसी प्रश्न की जिज्ञासा हम देखते है। यह सब कहाँ से आया ? जिस समय अस्ति, नास्ति कुछ भी नहीं था, जब अन्धकार अन्धकार से ढँका हुआ था तब किसने इस जगत का सृजन किया ? कैसे किया ? कौन इस रहस्य को जानता है ? आज तक यही प्रश्न चला आ रहा है। लाखो बार इसका उत्तर देने की चेष्टा की गई है, किन्तु

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फिर भी लाखों बार उसका उत्तर पुनः देना पड़ेगा। ये सभी उत्तर भ्रमपूर्ण हो, ऐसी बात नहीं है। प्रत्येक उत्तर मे कुछ न कुछ सत्य अवश्य है—कालचक्र के साथ साथ इस सत्य का भी क्रमशः बल बढ़ेगा। मैने भारत के प्राचीन दार्शनिको के निकट इस प्रश्न का जो उत्तर संग्रह किया है, उसको आजकल के मानवीय ज्ञान के साथ मिला कर आपके सामने रखने की चेष्टा करूँगा।

हम देखते है कि इस प्राचीनतम प्रश्न के कई विषय पहले से ही विदित थे। प्रथम तो—“जब अस्ति नास्ति कुछ भी नहीं था”—इस प्राचीन वैदिक वाक्य से प्रमाणित होता है कि एक समय जगत् नही था—ये ग्रह नक्षत्र, हमारी धरती माता, सागर, महासागर, नदी, शैलमाला, नगर, ग्राम, मानवजाति, अन्य प्राणी, उद्भिद, पक्षी, यह अनन्त प्रकार की सृष्टि, एक समय था जब यह नहीं थी—यह बात पहले से ही मालूम थी। क्या हम इस विषय मे निःसन्देह है? यह सिद्धान्त किस प्रकार प्राप्त हो गया यह समझने की हम चेष्टा करेगे। मनुष्य अपने चारो ओर क्या देखता है? एक छोटे से उद्भिद को ही लीजिये। मनुष्य देखता है कि उद्भिद धीरे धीरे मिट्टी को हटा कर उठता है, अन्त मे बढ़ते बढ़ते एक विशाल वृक्ष हो जाता है, फिर वह मर जाता है—केवल बीज छोड़ जाता है, मानो वह घूम फिर कर एक वृत्त को पूरा करता है। बीज से ही वह निकलता है, फिर वृक्ष हो जाता है और उसके बाद फिर बीज मे ही परिणत हो जाता है। पक्षी को देखिये, किस प्रकार वह अण्डे में से निकलता है, सुन्दर पक्षी का रूप धारण करता है, कुछ दिन जीवित रहता है, अन्त में मर जाता है, और छोड़ जाता है अन्य कई अण्डे अर्थात्

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भविष्य के पक्षियों के बीज। तिर्यग्जातियों के सम्बन्ध मे भी इसी प्रकार होता है और मनुष्य के सम्बन्ध में भी। प्रत्येक पदार्थ के ही जैसे कुछ बीज होते है, कुछ मूल उपादान होते है, कुछ सूक्ष्म आकार से लेकर स्थूल से स्थूलतर होते जाते है। कुछ समय तक ऐसे ही चलता है, फिर उसी सूक्ष्म रूप में जा कर उनका लय हो जाता है। वृष्टि की एक बूँद जिसके भीतर इस समय सुन्दर सूर्यकिरणे खेल रही है, वायु के सहारे बहुत दूर जाकर पर्वत पर पहुँचता है, वहाँ बर्फ में परिणत हो जाता है, फिर जल बन जाता है और सैकड़ों मील की यात्रा करके अपने उत्पत्तिस्थान समुद्र में पहुँच जाता है। हमारे चारो ओर स्थित समस्त प्रकृति का यही नियम है; और हम जानते है कि आजकल बर्फ की चट्टाने और नदियाँ बड़े बड़े पर्वतों क ऊपर क्रिया कर रही है, वे धीरे धीरे और निश्चित रूप से उन्हें (पर्वतों को) घिस रही है, घिस कर उन्हे बालू कर रही है, वही बालू समुद्र मे जाकर गिर रही है—समुद्र के अन्दर स्तर पर स्तर जम रही है, अन्त मे वह पहाड़ की भाँति सख्त हो जाती है और भविष्य में वही पर्वत बन जायगी। फिर वह पिस कर बालू बन जायगी—बस यही क्रम है।' बालुका से इन पर्वतमालाओं की उत्पत्ति है और बालुका मे ही इनकी परिणति है। बड़े बड़े नक्षत्रों के सम्बन्ध में भी यही बात है; हमारी यह पृथ्वी भी नीहारिकामय एक विशेष पदार्थ (Nebulae) से प्रारम्भ होकर क्रमशः शीतल होती गई, अन्त मे हमारे निवास करने की भूमि के रूप मे एक विशेष आकृति की धरणी बन गई। भविष्य मे यह और भी शीतल होते होते नष्ट हो जायगी, खण्ड खण्ड हो जायगी, धूल हो जायगी, और फिर उसी मूल नीहारिकामय सूक्ष्म

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रूप में परिणत हो जायगी। प्रतिदिन हमारी आँखों के सामने यही हो रहा है, स्मृति के अतीत काल से ही यह हो रहा है। यही मनुष्य का समस्त इतिहास है, प्रकृति का इतिहास है, जीवन का इतिहास है।

यदि यह सत्य हो कि प्रकृति अपने सभी कार्यों में सम-प्रणालीबद्ध (Uniform) है और आज तक किसी ने भी इसका खण्डन नहीं किया कि एक छोटा सा बालू का कण जिस प्रणाली और नियम से सृष्ट होता है, प्रकाण्ड सूर्य, तारे, यहाँ तक कि सम्पूर्ण जगत्ब्रह्माण्ड की सृष्टि में भी वही प्रणाली, वही एक नियम है; यदि यह सत्य हो कि एक परमाणु जिस कौशल से बनता है, समस्त जगत् भी उसी कौशल से बनता है; यदि यह सत्य हो कि एक ही नियम समस्त जगत् में प्रतिष्ठित है तो प्राचीन वैदिक भाषा में हम कह सकते हैं, “एक ढेला मिट्टी को जान कर हम जगत्ब्रह्माण्ड में जितनी मिट्टी है उस सबको जान सकते हैं।” एक छोटे से उद्भिद को लेकर उसके जीवनचरित की आलोचना करके हम जगत्ब्रह्माण्ड का स्वरूप जान सकते हैं। बालू के एक कण की गति का पर्यवेक्षण करके हम समस्त जगत् का रहस्य जान सकेंगे। अतएव ऊपर की हुई आलोचना के परिणाम को जगत्-ब्रह्माण्ड के ऊपर प्रयोग करके हम यही देखते हैं कि सभी वस्तुओं का आदि और अन्त प्रायः एक सा होता है। पर्वत की उत्पत्ति वालुका से, और वालुका मे ही उसका अन्त है; वाष्प से नदी बनती है और फिर वाष्प हो जाती है; बीज से उद्भिद होता है और फिर बीज बन जाता है; मानव जीवन मनुष्य के जीवाणु रूपी

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बीज से आता है और फिर जीवाणु में ही चला जाता है। नक्षत्र-पुञ्ज, नदी, ग्रह, उपग्रह सब नीहारिका-अवस्था से बनते है और फिर उसी अवस्था में लौट जाते है। इससे हम क्या सीखते है? सीखते यही हैं कि व्यक्त अर्थात् स्थूल अवस्था कार्य है; सूक्ष्म भाव उसका कारण है। सभी दर्शनों के जनक स्वरूप महर्षि कपिल बहुत दिन पहले प्रमाणित कर चुके है, “नाशः कारणलयः।”

यदि इस मेज़ का नाश हो जाय तो यह केवल अपने कारण रूप मे लौट जायगी—वह सूक्ष्म रूप भी उन परमाणुओं मे बदल जायगा जिनके मिश्रण से यह मेज़ नामक पदार्थ बना था। मनुष्य जब मर जाता है तो जिन पञ्च भूतों से उसके शरीर का निर्माण हुआ था उन्ही मे उसका लय हो जाता है। इस पृथ्वी का जब ध्वंस हो जायगा तब जिन भूतों को मिलाकर इसका निर्माण हुआ था उन्ही मे वह फिर परिणत हो जायगी। इसी को नाश अर्थात् कारणलय कहते है। अतएव हमने सीखा कि कार्य और कारण अभिन्न है—भिन्न नहीं; कारण ही विशेष रूप धारण करने पर कार्य कहलाता है। जिन उपादानो से इस मेज़ की उत्पत्ति हुई वे ही कारण हैं और मेज़ कार्य; और वे ही कारण मेज़ के रूप मे वर्तमान ह। यह गिलास भी कार्य है—इसके कई कारण थे, वे ही कारण इस कार्य मे हम अब भी वर्तमान देख रहे है। ‘गिलास’ (काँच) नामक कुछ पदार्थ और उसके साथ साथ बनानेवाले के हाथों की शक्ति ये दोनों कारण—निमित्त और उपादान ये दोनों कारण—मिलकर गिलास नामक यह आकार बना है। ये दोनों ही कारण वर्तमान हैं। जो शक्ति किसी यंत्र के चक्र मे थी वह संयोजक