भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

६४ ज्ञानयोग

६४ ज्ञानयोग

तुम तो भेड़ नहीं हो, तुम सिंह हो।” मेष-सिंह बोल उठा—“क्या कह रहे हो? मै भेड़ हूँ, सिंह कैसे हो सकता हूँ?” उसे किसी प्रकार विश्वास नहीं हुआ कि वह सिंह है, और वह भेड़ों की भाँति चीत्कार करने लगा। तब सिंह उसे उठा कर एक सरोवर के किनारे ले गया और बोला—“यह देखो अपना प्रतिबिम्ब, यह देखो मेरा प्रतिबिम्ब।” और तब वह इन दोनों की तुलना करने लगा। वह एक बार सिंह की ओर, और एक बार अपने प्रतिबिम्ब की ओर ध्यान से देखने लगा। उस समय क्षण भर मे ही उसका यह ज्ञान जाग गया कि ‘सचमुच, मै तो सिंह ही हूँ।’ तब वह सिंहगर्जना करने लगा और उसका भेड़ों का सा चीत्कार न जाने कहाँ चला गया! तुम सब सिंह स्वरूप हो, तुम आत्मा हो, शुद्धस्वरूप, अनन्त और पूर्ण। जगत् की महाशक्ति तुम्हारे भीतर है। “हे सखा, क्यो रोदन करते हो? जन्म-मृत्यु तुम्हारा भी नहीं है, मेरा भी नही है। क्यों रोते हो? तुम्हे रोग, दुःख कुछ भी नहीं है, तुम अनन्त आकाश स्वरूप हो जिसके ऊपर नाना प्रकार के मेघ आते है और कुछ देर खेल कर न जाने कहाँ अन्तर्हित हो जाते है; किन्तु आकाश जैसा पहले नीला था वैसा ही नीला रह जाता है।” इसी प्रकार के ज्ञान का अभ्यास करना होगा। हम जगत् मे पाप-ताप क्यों देखते है? कारण, हम स्वय ही असत् है। एक मार्ग मे एक ठूँठ खड़ा था। एक चोर उधर से जा रहा था, उसने समझा यह कोई पहरेवाला है। नायक ने समझा, वह उसकी नायिका है। एक बच्चे ने जब उसे देखा तो भूत समझ कर चीत्कार करने लगा। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने इस प्रकार यद्यपि उसे भिन्न-भिन्न रूपों मे देखा, तथापि वह एक ठूँठ के अतिरिक्त और कुछ भी नही था।

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ६५

हम स्वयं जैसे होते है जगत् को वैसा ही देखते है। एक मेज़ पर एक मोहर की थैली रख दो और सोचो कि यहाँ पर एक बच्चा बैठा है। एक चोर ने आकर उस थैली को ले लिया। क्या बच्चा समझेगा कि चोरी हो गई ? हमारे भीतर जो है वही हम बाहर भी देखते हैं। बच्चे के मन में चोर नहीं था, अतएव उसने चोर को नहीं देखा। सब प्रकार के ज्ञान के सम्बन्ध मे ऐसा ही होता है। जगत् के पाप, अत्याचार की बात मत कहना। किन्तु तुम्हे जगत् मे अब भी जो पाप देखना पड़ता है उसके लिये रोदन करो। अपने लिये रोओ कि तुम्हें अब भी सर्वत्र पाप देखना पड़ता है। और यदि तुम जगत् का उपकार करना चाहते हो तो जगत् के ऊपर दोषारोपण करना छोड़ दो। उसे और भी दुर्बल मत करो। यह सब पाप, दुःख आदि क्या हैं ? यह सब तो दुर्बलता का ही फल है। लोग बचपन से ही शिक्षा पाते है कि वे दुर्बल है, वे पापी है। इस प्रकार की शिक्षा से जगत् दिन पर दिन दुर्बल होता जा रहा है। उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की सन्तान हैं—और तो क्या, जिसके भीतर आत्मा का प्रकाश अति क्षीण है उसे भी यही सिखाओ। बाल्य-काल से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार की चिन्ताएँ प्रविष्ट कर दो जिनसे कि उनकी यथार्थ सहायता हो सके, जो उनको सबल बनाये, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो, जिससे दुर्बलता तथा अवसादकारक चिन्ता उनके मस्तिष्क मे प्रवेश ही न करे। सच्चिन्ता के स्रोत मे शरीर को डुबा दो, अपने मन से सर्वदा कहो—'मै ही वह हूँ, मै ही वह हूँ।' तुम्हारे मन में दिन रात यह बात संगीत की भाँति बजती रहे, और मृत्यु के समय भी 'सोऽहम्, सोऽहम्' बोलते हुए मरो। यही सत्य है—जगत् की अनन्त शक्ति

६६ ज्ञानयोग

६६ ज्ञानयोग

तुम्हारे भीतर है। जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढके रखता है, उसे भगा दो। साहसी बनो। सत्य को जान कर उसे जीवन मे परिणत करो, चरम लक्ष्य बहुत दूर हो सकता है, किन्तु 'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत।'

४. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

(न्यूयार्क में दिया हुआ भाषण)

हम यहाँ खडे है परन्तु हमारी दृष्टि दूर, बहुत दूर—अनेक समय, कोसो दूर चली जाती है। जब से मनुष्य ने चिन्ता करना आरम्भ किया तभी से उसको यह आदत रही है। मनुष्य सदा ही वर्तमान से बाहर देखने की चेष्टा करता है, वह जानना चाहता है कि इस शरीर के नष्ट होने के बाद वह कहाँ चला जाता है। इसी रहस्य को उद्घाटित करने के लिये अनेक मतो का प्रचार हुआ; सैकड़ों मतो की स्थापना हुई, और सैकडो मत खण्डित होकर छोड़ भी दिये गये; और जितने दिन मनुष्य इस जगत् मे रहेगा, जितने दिन वह चिन्ता करता रहेगा उतने दिन ऐसे ही चलेगा। इन सब मतो में ही कुछ न कुछ सत्य है। और इन्ही मे बहुतसा असत्य भी है। इस सम्बन्ध मे भारत मे जो अनुसन्धान हुआ है उसीका सार, उसीका फल मै आपके सामने रखने की चेष्टा करूँगा। भारतीय दार्शनिकों के इन सब मतों का समन्वय करने तथा यदि हो सका तो उसके साथ आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों का भी समन्वय करने की चेष्टा करूँगा।

वेदान्त-दर्शन का एक ही उद्देश्य है—एकत्व का अनुसन्धान या अन्वेषण। हिन्दू लोग विशेष के पीछे नहीं दौड़ते, वे सदा ही सामान्य वस्तु का—नहीं नहीं, सर्वव्यापी सार्वभौमिक वस्तु का

६८

ज्ञानयोग

अन्वेषण करते हैं। हम देखते हैं कि उन्होंने वार वार इसी एक सत्य का अनुसन्धान किया है—“ ऐसा कौन सा पदार्थ है जिसके जान लेने से सब कुछ जाना जा सकता है ?” जिस प्रकार मिट्टी के एक ढेले को जान लेने पर जगत् की सारी मिट्टी को जान लिया जाता है उसी प्रकार ऐसी कौनसी वस्तु है जिसे जान कर जगत् की सभी वस्तुये जानी जा सकती हैं ? यही उनका एक मात्र अनुसन्धान है, यही उनकी एकमात्र जिज्ञासा है। उनके मत से समस्त जगत् का विश्लेषण करके उसे एकमात्र ‘आकाश’ में पर्यवसित किया जा सकता है। हम अपने चारो ओर जो कुछ भी देखते हैं, छूते हैं, आस्वादन करते हैं, अधिक क्या, हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं वह सब केवल इसी आकाश का विभिन्न विकास मात्र है। यह आकाश सूक्ष्म और सर्व्वव्यापी है। कठिन, तरल, वाष्पीय, सब पदार्थ, सब प्रकार की आकृतियाँ, शरीर, पृथ्वी, सूर्य्य, चन्द्र, तारा—सब इसी आकाश से उत्पन्न हैं। किस शक्ति ने इस आकाश पर कार्य करके इसमे से जगत् की सृष्टि की ? आकाश के साथ एक सर्व्वव्यापी शक्ति रहती है। जगत् में जितनी भी भिन्न भिन्न शक्तियाँ हैं—आकर्षण, विकर्षण, यहाँ तक कि चिन्ताशक्ति भी, सभी प्राण नामक एक महाशक्ति का विकास मात्र है। इसी प्राण ने आकाश के ऊपर कार्य करके इस जगत्-प्रपञ्च की रचना की है। कल्प के प्रारम्भ में यही प्राण मानो अनन्त आकाश-समुद्र में प्रसुप्त रहता है। प्रारम्भ मे यह आकाश गतिहीन होकर अवस्थित था। बाद में प्राण के प्रभाव से इस आकाश-समुद्र मे गति उत्पन्न होती है। और इस प्राण की जैसे ही गति होती है वैसे ही इस आकाश-समुद्र मे से नाना ब्रह्माण्ड, नाना जगत्, कितने ही सूर्य्य, चन्द्र, तारा—

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ६९

गण, पृथ्वी, मनुष्य, जन्तु, उद्भिद् और नाना शक्तियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। अतएव हिन्दुओ के मत से सब प्रकार की शक्ति प्राण का और सब प्रकार के दृश्य पदार्थ आकाश का विभिन्न स्वरूप मात्र हैं; कल्पान्त मे सभी घन पदार्थ पिघल जायेंगे, और वह तरल पदार्थ वाष्पीय आकार में परिणत हो जायगा। वह फिर तेज रूप धारण करेगा। अन्त मे सब कुछ जिसमे से उत्पन्न हुआ था उसी आकाश मे विलीन हो जायगा। और आकर्षण, विकर्षण, गति आदि समस्त शक्तियाँ धीरे धीरे मूल प्राण मे परिणत हो जायँगी। उसके बाद जब तक फिर कल्पारम्भ नहीं होता तब तक यह प्राण मानो निद्रित अवस्था मे रहेगा। कल्पारम्भ होने पर वह फिर जाग कर नाना रूपों को प्रकाशित करेगा और कल्पान्त मे सभी कुछ लय हो जायगा। इसी प्रकार वह आता है, जाता है, एक बार पीछे और एक बार आगे—मानो झूल रहा है। आधुनिक विज्ञान की भाषा मे कहेगे कि एक समय वह स्थितिशील (Static) रहता है, फिर गतिशील (Dynamic) हो जाता है; एक समय प्रसुप्त रहता है और फिर क्रियाशील हो जाता है। इसी रूप से अनन्त काल से चला आरहा है।

किन्तु यह विश्लेषण भी अधूरा ही रहा। आधुनिक पदार्थ-विज्ञान ने भी यही तक जान पाया है। इसके ऊपर भौतिक विज्ञान की गति नहीं है। किन्तु इस अनुसन्धान का यहाँ अन्त नहीं हो जाता। हमने अभी तक उस वस्तु को प्राप्त नहीं किया जिसे जान कर सब कुछ जाना जा सके। हमने समस्त जगत् को भूत और शक्ति मे अथवा प्राचीन भारतीय दार्शनिको के शब्दो मे आकाश

७० ज्ञानयोग

७० ज्ञानयोग

और प्राण मे पर्यवसित कर दिया। अब आकाश और प्राण को किसी एक वस्तु मे पर्यवसित करना होगा। इन्हे मन नामक उच्चतर क्रिया-शक्ति मे पर्यवसित किया जा सकता है। महत् अथवा समष्टि चिन्ता-शक्ति से प्राण और आकाश दोनो की उत्पत्ति होती है। चिन्ता-शक्ति ही इन दो शक्तियों के रूप मे विभक्त हो जाती है। प्रारम्भ मे यही सर्वव्यापी मन था। इसी ने परिणत होकर आकाश और प्राण रूप धारण किये और इन्हीं दोनो के सम्मिश्रण से समस्त जगत् बना।

अब हम मनस्तत्व की आलोचना करेगे। मै आपको देख रहा हूँ। आँखे विषय को ग्रहण कर रही है और अनुभूतिजनक स्नायु उसे मस्तिष्क मे प्रेरित कर रहे है। आँखे देखने का साधन नही है, वे केवल बाहरी यन्त्र है, कारण देखने का जो वास्तविक साधन है, जो मस्तिष्क मे विषय-ज्ञान को संवाद ले जाता है, उसको यदि नष्ट कर दिया जाय तब मेरी बीस आँखे रहते हुए भी आप मे से किसी को भी मै नही देख सकूँगा। अक्षिजाल (Retina) के ऊपर पूरा अक्स या प्रतिबिम्ब पड़ सकता है फिर भी तुम सब को मै देख नहीं पाऊँगा। अतएव सिद्ध है कि वास्तविक दर्शनेन्द्रिय इस आँख से पृथक् कोई वस्तु है; प्रकृत चक्षुरिन्द्रिय अवश्य ही चक्षुयन्त्र के पीछे विद्यमान है। सभी प्रकार की विषयानुभूति के सम्बन्ध मे इसी प्रकार समझना चाहिये। नासिका घ्राणेन्द्रिय नही है; वह केवल यन्त्र मात्र है, उसके पीछे घ्राणेन्द्रिय है। प्रत्येक इन्द्रिय के सम्बन्ध मे समझना होगा कि पहले तो इस स्थूल शरीर मे बाह्य यन्त्र लगे हुये है; पीछे किन्तु इसी स्थूल शरीर मे इन्द्रियाँ भी मौजूद हैं। किन्तु इन सब से भी काम नही चलता! मान लीजिये, मै आपसे कुछ कह रहा हूँ-

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप — ७१

और आप बड़े मनोयोग के साथ मेरी बात सुन रहे हैं, इसी समय यहाँ एक घण्टा बजता है; शायद आप उस घण्टे की ध्वनि को नहीं सुन सकेगे। यह शब्द-तरंग आपके कान मे पहुँच कर कान के पर्दे मे लगी, स्नायुओ के द्वारा यह संवाद् मस्तिष्क मे पहुँचा, किन्तु फिर भी आप उसे क्यों नहीं सुन सके ? यदि मस्तिष्क मे संवाद् वहन करने तक ही समस्त श्रवण-प्रक्रिया सम्पूर्ण हो जाती, तो फिर तुम क्यो नही सुन पा सके ? अतएव मालूम हुआ कि सुनने की प्रक्रिया के लिये और भी कुछ आवश्यक है—मन इन्द्रिय से युक्त नहीं था । जिस समय मन इन्द्रियों से पृथक रहता है उस समय इन्द्रियाँ उसके पास जो कुछ भी संवाद लायेगी मन उनको ग्रहण नही करेगा। जब मन उनसे युक्त रहता है तभी वह किसी संवाद को ग्रहण करने मे समर्थ होता है । किन्तु इससे भी विषयानुभूति , पूर्ण नही होगी । बाहरी यन्त्र संवाद् वहन कर सकता है, इन्द्रियगण उसे भीतर ले जा सकती है और मन इन्द्रियों से संयुक्त रह सकता है, फिर भी विषयानुभूति पूर्ण नही होगी । एक वस्तु और आवश्यक है। भीतर से प्रतिक्रिया आवश्यक है। प्रतिक्रिया से ही ज्ञान उत्पन्न होगा । बाहर की वस्तु ने मानों मेरे अन्दर संवाद-प्रवाह प्रेरित किया। मेरे मन ने उसे लेकर बुद्धि के निकट अर्पण कर दिया, बुद्धि ने पहले से बने हुये मन के संस्कारो के अनुसार उसे सजाया और बाहर की ओर प्रतिक्रिया-प्रवाह की प्रेरणा की, इसी प्रतिक्रिया के साथ साथ विषयानुभूति होती है। मन की जो शक्ति इस प्रतिक्रिया की प्रेरणा करती है उसे ' बुद्धि ' कहते है। किन्तु फिर भी अभी विषयानुभूति पूर्ण नहीं हुई। मान लीजिये, एक चित्रक्षेपक यन्त्र है और एक पर्दा है। मै इस पर्दे पर एक चित्र डालने की चेष्टा कर रहा हूँ। तो मै क्या

७२ ज्ञानयोग

७२ ज्ञानयोग

करूँगा ? मै उस यन्त्र से नाना प्रकार की प्रकाश-किरणें इस पर्दे पर डालने की और उन्हे एक स्थान में एकत्रित करने की चेष्टा करूँगा। एक ऐसी अचल वस्तु की आवश्यकता है जिस पर चित्र डाला जा सके। किसी चञ्चल वस्तु पर यह करना असम्भव है, कोई स्थिर वस्तु चाहिये। कारण, मै जो प्रकाश-किरणे डालना चाहता हूँ वे चञ्चल है; इन चञ्चल प्रकाश-किरणों को किसी अचल वस्तु के ऊपर एकत्रीभूत, एकीभूत करके एक जगह लाना होगा। यही बात उन संवादों के विषय मे भी है जिन्हें इन्द्रियाँ मन के आगे और मन बुद्धि के आगे समर्पित करता है, जब तक ऐसी कोई वस्तु नहीं मिल जाती जिस पर यह चित्र डाला जा सके, जिस पर भिन्न भिन्न भाव एकत्रीभूत हो कर मिल सके तब तक यह विषयानुभूति भी पूर्ण नही होगी। वह क्या वस्तु है जो समुदाय को एकत्व का भाव प्रदान करती है। वह कौनसी वस्तु है जो विभिन्न गतियो के भीतर भी प्रतिक्षण एकत्व की रक्षा किये रहती है ? वह कौन सी वस्तु है जिसके ऊपर भिन्न भिन्न भाव मानो एक ही जगह गूँथे रहते हैं, जिसके ऊपर विषय आकर मानो एक जगह वास करते है और एक अखण्ड भाव को धारण करते है ? हमने देखा कि ऐसी कोई वस्तु आवश्यक ह और उस वस्तु का शरीर और मन की तुलना मे अचल होना भी आवश्यक है। जिस पर्दे के ऊपर यह चित्रक्षेपक यन्त्र चित्र डाल रहा है वह इन प्रकाश-किरणो की तुलना मे अचल है, ऐसा न होने पर चित्र पडेगा ही नहीं। अर्थात् इसका एक व्यक्ति ( Individual ) होना आवश्यक है। यही वस्तु, जिसके ऊपर मन यह सब चित्रांकन करता है, यही वस्तु जिसके ऊपर मन और बुद्धि द्वारा ले जायी

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप · ७३

जाकर हमारी विषयानुभूति स्थापित, श्रेणीबद्ध और एकत्रीभूत होती है, इसी को मनुष्य की आत्मा कहते हैं।

तो, हमने देखा कि समष्टि मन या महत्, आकाश और प्राण इन दो भागो मे विभक्त रहता है। और मन के पीछे आत्मा रहता है। समष्टि मन के पीछे जो आत्मा है उसको ईश्वर कहते है। व्यष्टि मे यह मनुष्य की आत्मा मात्र है। जिस प्रकार समष्टि मन आकाश और प्राण के रूप मे परिणत हो गया है उसी प्रकार समष्टि आत्मा भी मन के रूप मे परिणत हो गया है। अब प्रश्न उठता है—क्या इसी प्रकार व्यष्टि मनुष्य के सम्बन्ध मे भी समझना होगा? मनुष्य का मन भी क्या उसके शरीर का स्रष्टा है और क्या उसका आत्मा उसके मन का स्रष्टा है? अर्थात् मनुष्य का शरीर, मन और आत्मा—ये तीन विभिन्न वस्तुये है, अथवा ये एक के भीतर ही तीन है, अथवा ये सब एक पदार्थ की ही तीन विभिन्न अवस्थाएँ मात्र है? हम क्रमशः इसी प्रश्न का उत्तर देने की चेष्टा करेगे। जो भी हो, हमने अब तक यही देखा कि पहले तो यह स्थूल देह है, उसके बाद इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और बुद्धि के भी बाद आत्मा। तो पहली बात यह हुई कि आत्मा शरीर से पृथक तथा मन से भी पृथक वस्तु है। यहीं से धर्म जगत् मे मतभेद देखा जाता है। द्वैतवादी कहते है कि आत्मा सगुण है अर्थात् भोग, सुख, दुःख—सभी यथार्थ में आत्मा के धर्म है; अद्वैतवादी कहते है कि वह निर्गुण है।

हम पहले द्वैतवादियों के मत का—आत्मा और उसकी गति के सम्बन्ध मे उनके मत का वर्णन करके उसके बाद जो मत इसका सम्पूर्ण रूप से खण्डन करता है उसका वर्णन करेगे। अन्त मे

७४

ज्ञानयोग

अद्वैतवाद के द्वारा दोनों मतों का सामञ्जस्य सिद्ध करने की चेष्टा करेंगे। यह मानवात्मा शरीर और मन से पृथक् है एवं आकाश और प्राण से गठित नहीं है इसीलिये अमर है। क्यो ? मर्त्यत्व या विनश्वरत्व का अर्थ क्या है ? जो विश्लिष्ट हो जाता है वही विनश्वर है। और जो वस्तु कई एक पदार्थों के संयोग से बनती है वही विश्लिष्ट होगी; केवल वह पदार्थ जो अन्य पदार्थों के संयोग से उत्पन्न नहीं है, कभी विश्लिष्ट नहीं होता, इसीलिये उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। वह अविनाशी है। वह अनन्त काल से है, उसकी कभी सृष्टि नहीं हुई। सृष्टि तो केवल सयोग मात्र है। शून्य से कभी किसी ने सृष्टि नहीं देखी। सृष्टि के सम्बन्ध में हम केवल यह जानते हैं कि यह पहले से वर्तमान कितनी ही वस्तुओ का नये नये रूप मे एकत्र मिलन मात्र है। यदि ऐसा है तो यह मानवात्मा भिन्न भिन्न वस्तुओ के संयोग से उत्पन्न नहीं है, अतः वह अवश्य ही अनन्त काल से है और अनन्त काल तक रहेगा। इस शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा रहेगा। वेदान्तवादियों के मत से—जब इस शरीर का नाश हो जाता है तब मनुष्य की इन्द्रियो का मन मे लय हो जाता है, मन का प्राण मे लय हो जाता है, प्राण आत्मा मे प्रविष्ट हो जाता है और उस समय वही मानवात्मा मानो सूक्ष्म शरीर अथवा लिंग शरीर रूपी वस्त्र पहिन कर चला जाता है। इसी सूक्ष्म शरीर मे मनुष्य के समस्त संस्कार वास करते हैं। संस्कार क्या है ? मन मानो तालाब के समान है—और हमारी प्रत्येक चिन्ता मानों उसी तालाब की लहर के समान है। जिस प्रकार तालाब में लहर उठती है, गिरती है, गिरकर अन्तर्हित हो जाती है उसी प्रकार मन मे ये सब चिन्ताओ की तरंगे लगातार

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ७५

उठती और अन्तर्हित होती रहती हैं। किन्तु वे एकदम अन्तर्हित भी नही होतीं। वे क्रमशः सूक्ष्मतर होती जाती है, परन्तु वर्तमान रहती ही है। प्रयोजन होने पर फिर उठती हैं। जिन चिन्ताओ ने सूक्ष्मतर रूप धारण कर लिया है उन्हीं मे से कुछ एक को फिर तरङ्गाकार मे लाने को ही स्मृति कहते है। इसी प्रकार हमने जो कुछ ही चिन्ता की है, जो कुछ कार्य हमने किये है सभी कुछ मन के अन्दर अवस्थित है। ये सब सूक्ष्म भाव से ही स्थित रहते है और मनुष्य के मर जाने पर भी ये संस्कार उसके मन मे रहते है—फिर वे सूक्ष्म शरीर के ऊपर कार्य करते रहते है। आत्मा ये ही सब संस्कार एवं सूक्ष्म शरीर रूपी वस्त्र धारण करके चला जाता है और यह विभिन्न संस्कार रूप विभिन्न शक्तियो का समवेत फल ही आत्मा की गति को नियमित करता है। उनके मत से आत्मा की तीन प्रकार की गति होती है।

जो अत्यत धार्मिक हैं उनकी मृत्यु के बाद वे सूर्यरश्मियों का अनुसरण करते है; सूर्यरश्मियो का अनुसरण करके वे सूर्यलोक मे जाते है; वहाँ से वे चन्द्रलोक और चन्द्रलोक से विद्युल्लोक मे उपस्थित होते हैं; वहाँ एक मुक्त आत्मा से उनका साक्षात्कार होता हैं; वे इन जीवात्माओं को सर्वोच्च ब्रह्मलोक मे ले जाते है। यहाँ उन्हे सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त होती है; उनकी शक्ति और ज्ञान प्रायः ईश्वर के समान हो जाता है, और द्वैतवादियों के मत मे वे अनन्त काल तक वहाँ वास करते है, अथवा अद्वैतवादियो के अनुसार कल्पान्त मे ब्रह्म के साथ एकत्व लाभ करते है। जो लोग सकाम भाव से सत्कार्य करते है वे मृत्यु के बाद चन्द्रलोक मे जाते है, वहाँ नाना

७६ ज्ञानयोग

७६ ज्ञानयोग

प्रकार के स्वर्ग हैं। वे वहाँ पर सूक्ष्मशरीर—देवशरीर प्राप्त करते हैं। वे देवता होकर वहाँ वास करते हैं और दीर्घ काल तक स्वर्ग के सुखों का उपभोग करते हैं। इस भोग का अन्त होने पर फिर उनका प्राचीन कर्म बलवान हो जाता है; अतः फिर उनका मर्त्यलोक मे पतन हो जाता है। वे सब वायुलोक, मेघलोक आदि लोकों के भीतर होकर आते हैं और अन्त मे वृष्टिधारा के साथ पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। वृष्टि के साथ गिर कर वे किसी शस्य का आश्रय ले कर रहते हैं। इसके बाद जब कोई व्यक्ति उस अन्न को खाता है तब उसकी औरस सन्तति मे वह जीवात्मा फिर शरीर धारण करता है। जो लोग अत्यंत दुष्ट हैं उनकी मृत्यु होने पर वे भूत अथवा दानव हो जाते हैं और चन्द्रलोक और पृथ्वी के बीच किसी स्थान मे वास करते हैं। उनमे से कोई कोई मनुष्यों के ऊपर बड़ा अत्याचार करते हैं और कोई कोई मनुष्यो से मैत्री भी कर लेते हैं। वे कुछ समय तक इसी स्थान मे रहकर फिर पृथ्वी पर आकर पशु-जन्म लेते हैं। कुछ समय पशु-देह मे रहकर वे फिर मनुष्यत्व लाभ करते हैं और फिर एक बार मुक्तिलाभ करने की उपयोगी अवस्था को प्राप्त करते हैं। तो हमने देखा कि जो लोग मुक्ति की निकटतम सीढ़ी पर पहुँच गये हैं, जिनके भीतर कम अपवित्रता रह गई है वे ही सूर्य की किरणों के सहारे ब्रह्मलोक मे जाते हैं। जो मध्य वर्ग के लोग हैं, जो स्वर्ग जाने की इच्छा से सत्कर्म करते हैं वे ही सब चन्द्रलोक मे जाकर वहाँ के स्वर्गों मे वास करते हैं और देवशरीर को भी प्राप्त करते हैं, किन्तु उन्हे मुक्तिलाभ करने के लिये फिर मनुष्य देह धारण करना पडता है। और जो अत्यन्त दुष्ट हैं वे भूत, दानव आदि रूप मे परिणत होते हैं, उसके बाद वे पशु होते हैं; और मुक्तिलाभ के लिये उन्हे फिर मनुष्यजन्म

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ७७

ग्रहण करना पड़ता है। इस पृथ्वी को कर्मभूमि कहा जाता है। अच्छा बुरा सभी कर्म यहीं करना होता है। मनुष्य स्वर्गकाम होकर सत्कार्य करने पर स्वर्ग मे जाकर देवता हो जाता है; इस अवस्था मे वह कोई नया कर्म नहीं करता, केवल पृथ्वी पर किये हुये अपने सत्कर्मों का फल भोग करता है। और जब ये सत्कर्म समाप्त हो जाते है उसी समय जो असत् या बुरे कर्म उसने पृथ्वी पर किये थे उनका सञ्चित फल वेग के साथ उसके ऊपर आ जाता है और उसे वहाँ से फिर एक बार पृथ्वी पर घसीट लाता है। इसी प्रकार जो भूत हो जाते है वे उसी अवस्था मे कोई नूतन कर्म न करते हुए केवल भूत कर्म का फल भोग करते रहते है; उसके बाद पशुजन्म ग्रहण कर वहाँ भी कोई नया कर्म नहीं करते। उसके बाद वे भी फिर मनुष्य हो जाते है।

मान लो कि एक व्यक्ति ने जीवन भर अनेक बुरे काम किए किन्तु एक बहुत अच्छा काम भी किया। ऐसी दशा मे उस सत्कार्य का फल उसी क्षण प्रकाशित हो जायगा, और इस सत्कार्य का फल शेष होते ही बुरे कार्यों का फल भी उसे मिलेगा। जिन सब लोगो ने अनेक अच्छे अच्छे बडे बड़े कार्य किये है किन्तु उनके समस्त जीवन की गति अच्छी नहीं रही, वे सब देवता हो जायेंगे। देवदेह से सम्पन्न होकर देवताओ की शक्ति का कुछ काल तक सम्भोग करके उन्हे फिर मनुष्य होना पड़ेगा। जिस समय सत्कर्मों की शक्ति क्षय हो जायगी उस समय फिर वही पुरातन असत्कार्यों का फल होने लगेगा। जो अत्यन्त बुरे कर्म करते है उन्हे भूतयोनि, दानवयोनि मे जाना पड़ेगा, और जब उनके बुरे कर्मों का फल समाप्त हो जायगा उस समय उनका जितना भी सत्कर्म शेष है उसके फल से वे फिर

७८ ज्ञानयोग

७८ ज्ञानयोग

मनुष्य हो जायेंगे। जिस मार्ग से ब्रह्मलोक मे जाया जाता है, जहाँ से, पतन अथवा प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं रहती उसे देवयान कहते हैं, और चन्द्रलोक के मार्ग को पितृयान कहते हैं।

अतएव वेदान्त-दर्शन के मत मे मनुष्य ही जगत् मे सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और यह पृथ्वी ही सर्वश्रेष्ठ स्थान है, कारण कि एक मात्र यहीं पर मुक्त होने की सम्भावना है। देवता आदि को भी मुक्त होने के लिये मनुष्य-जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। इसी मानव-जन्म मे ही मुक्ति की सब से अधिक सुविधा है।

अब हम इसके विरोधी मत की आलोचना करेंगे। बौद्ध लोग इस आत्मा का अस्तित्व एकदम अस्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि शरीर और मन के पीछे आत्मा नामक एक पदार्थ है, यह मानने की क्या आवश्यकता है? इस शरीर और मन का यन्त्र स्वतःसिद्ध है, यह कहने से क्या यथेष्ट व्याख्या नहीं हो जाती? और एक तीसरे पदार्थ की कल्पना से क्या लाभ? यह युक्ति खूब प्रबल है। जितनी दूर तक अनुसन्धान किया जाय, यही मालूम होता है कि यह शरीर और मन का यन्त्र स्वतःसिद्ध है, और हममे से अनेक इस तत्त्व को इसी भाव से देखते हैं। तब फिर शरीर और मन के अतिरिक्त अथच शरीर और मन के आश्रयभूमि स्वरूप आत्मा नामक एक पदार्थ के अस्तित्व की कल्पना की आवश्यकता क्या है? बस शरीर और मन कहना ही तो पर्याप्त है; नियत परिणामशील जड़स्रोत का नाम शरीर है और नियत परिणामशील चिन्तास्रोत का नाम मन है। तब जो एकत्व की प्रतीति हो रही है वह कैसे? बौद्ध कहते हैं कि यह एकत्व वास्तविक नहीं है। मान लो कि एक जलती मशाल को

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ७९

घुमाया जा रहा है। घुमाने पर एक ही अग्नि का वृत्तस्वरूप या गोल आकार हो जायगा। वास्तव में कोई वृत्त है नहीं, किन्तु मशाल के नियमित घूमने से उसने यह वृत्त का आकार धारण कर लिया है। इसी प्रकार हमारे जीवन मे भी एकत्व नही है; जड़ की राशि क्रमागत रूपं से चल रही है। सम्पूर्ण जड़राशि को एक कह कर संबोधित करने की इच्छा होगी तो कर सकते हो, किन्तु उसके अतिरिक्त वास्तव मे कोई एकत्व नहीं है। मन के सम्बन्ध मे भी यही बात है; प्रत्येक चिन्ता दूसरी चिन्ताओं से पृथक है। इस प्रबल चिन्तास्रोत मे ही इस भ्रमात्मक एकत्व का भाव रख दिया जाता है; अतएव फिर तीसरे पदार्थ की आवश्यकता क्या है ? यह जो कुछ देखा जाता है, यह जड़स्रोत और यह चिन्तास्रोत—केवल इन्हीं का अस्तित्व है; इनके बाद और कुछ सोचने की आवश्यकता ही क्या है ? अनेक आधुनिक सम्प्रदायों ने बौद्धों के इस मत को ग्रहण कर लिया है, किन्तु वे सभी इसे अपना अपना आविष्कार कह कर प्रतिपादित करना चाहते है। अधिकांश बौद्ध दर्शनो मे मोटी बात यही है कि यह दृश्यमान जगत् पर्याप्त है। इसके पीछे और कुछ है कि नहीं यह अनुसन्धान करने 'की बिलकुल ही आवश्यकता नहीं है। यह इन्द्रियग्राह्य जगत् ही सर्वस्व है—किसी वस्तु को इस जगत् के आश्रय रूप में कल्पना करने की आवश्यकता ही क्यो पड़ी ? सब ही गुणसमष्टि है। ऐसे अनुमानिक पदार्थ की कल्पना करने की क्या आवश्यकता है कि जिस मे वे सब गुण लगे रहे हो ? पदार्थ का ज्ञान आता है केवल गुणराशि के वेग से स्थान-परिवर्तन के कारण, कोई अपरिणामी पदार्थ वास्तव मे इनके पीछे है, ऐसी बात नहीं। हम देखते हैं कि यह युक्ति अति प्रबल है और साधारण मनुष्य की अनुभूति के पक्ष मे खूब सहायक

८०

ज्ञानयोग

हो जाती है। वास्तव में एक लाख मनुष्यों में एक व्यक्ति भी इस दृश्य जगत् से अतीत और किसी वस्तु की -धारणा भी कर सकता है कि नहीं इसमें सन्देह है। अधिकांश लोगों के लिये प्रकृति नित्य-परिणामशील मात्र है। हम लोगों मे भी कम लोगों ने हमारे सब के पीछे स्थित उस स्थिर समुद्र का कुछ कुछ आभास भी पाया होगा। हमारे लिये यह जगत् केवल तरंगपूर्ण है। इस प्रकार हमे दो मत मिलते हैं। एक तो यह कि शरीर और मन के पीछे एक अपरिणामी सत्ता रहती है; दूसरा यह कि इस जगत् में निश्चलत्व नामक कुछ भी नहीं है, सब कुछ चञ्चल है, सभी कुछ परिणाम है, जो हो अद्वैत-वाद में ही इन दोनो मतो का सामञ्जस्य मिलता है।

अद्वैतवादी कहते हैं, 'जगत् का एक अपरिणामी आश्रय है'—द्वैतवादियो की यह बात सत्य है। किसी अपरिणामी पदार्थ की कल्पना किये बिना हम परिणाम की कल्पना कर ही नहीं सकते। किसी अपेक्षाकृत अल्पपरिणामी पदार्थ की तुलना मे किसी पदार्थ की परिणाम के रूप मे चिन्ता की जा सकती है, और 'उसकी अपेक्षा 'भी अल्प परिणामी पदार्थ के साथ तुलना मे उसे भी परिणामी रूप मे निर्देश किया जा सकता है जब तक कि एक पूर्ण अपरिणामी पदार्थ को बाध्य होकर स्वीकार न कर लिया जाय। यह जगत्-प्रपञ्च अवश्य ही एक ऐसी अवस्था में था जब यह स्थिर शान्त था; जब यह दो शक्तियो के सामञ्जस्य-रूप मे था अर्थात् जब वास्तव मे किसी भी शक्ति का अस्तित्व नही था; कारण, वैषम्य न होने पर शक्ति का विकास नहीं होता। यह ब्रह्माण्ड फिर उसी साम्यावस्था की प्राप्ति की ओर जा रहा है। यदि हमारा किसी विषय के सम्बन्ध में निश्चित ज्ञान है, तो वह यही है।

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

८१

द्वैतवादी जब कहते हैं कि कोई अपरिणामी पदार्थ है तब वह ठीक ही कहते हैं; किन्तु वह शरीर और मन से बिलकुल अतीत है, शरीर और मन से बिलकुल पृथक् है, यह कहना भूल-है। बौद्ध लोग जो कहते है कि समुदय जगत् केवल परिणाम-प्रवाह मात्र है यह बात भी सत्य है; कारण, जब तक मै जगत् से पृथक् हूँ; जब तक मै अपने अतिरिक्त और सभी कुछ देख रहा हूँ, मोटी बात है कि जब तक द्वैतभाव रहेगा; तब तक यह् जगत् परिणामशील ही प्रतीत होगा। किन्तु वास्तविक बात यह है कि यह जगत् परिणामी भी है और अपरिणामी भी। आत्मा, मन और शरीर ये तीनो पृथक् वस्तुएँ नही है वरञ्च एक ही है। एक ही वस्तु कभी देह, कभी मन और कभी देह और मन से अतीत आत्मा प्रतीत होती है। जो शरीर की ओर देखते हैं व मन तक को भी नहीं देख सकते; जो मन को देखते है वे आत्मा को नही देख पाते; और जो आत्मा को देखते है उनके लिये शरीर और मन दोनो न जाने कहाँ चले जाते है ! जो लोग केवल गति देखते है वे सम्पूर्ण स्थिर भाव को नही देख पाते, और जो इस सम्पूर्ण स्थिर भाव को देख पाते है उनके निकट गति न जाने कहाँ चली जाती है। सर्प मे रज्जु का भ्रम हुआ। जो व्यक्ति रज्जु मे सर्प ही देखता है उसके लिये रज्जु कहाँ चली जाती है, और जब भ्रान्ति दूर होकर वह व्यक्ति रज्जु ही देखता है तो फिर उसके लिये सर्प नही रहता।

तो हमने देखा कि वस्तु एक ही है और वही एक नाना रूप से प्रतीत होती है। इसको आत्मा कहे या वस्तु कहे या अन्य कुछ नाम दे, जगत् मे एकमात्र इसी का अस्तित्व है। अद्वैतवादियो की

८२ ज्ञानयोग

८२ ज्ञानयोग

भाषा मे यह आत्मा ही ब्रह्म है, जो केवल नानारूप उपाधिवश अनेक प्रतीत हो रहा है। समुद्र की तरङ्गो की ओर देखो; एक भी तरङ् समुद्र से पृथक् नही है। तब फिर तरङ्ग पृथक् क्यो प्रतीत होती है? नामरूप ने—तरङ्ग की आकृति और हमने जो इसे तरङ्ग नाम दे दिया है उसी ने उसे समुद्र से पृथक् कर दिया है। नामरूप के नष्ट हो जाने या चले जाने पर वह जो समुद्र था वही रह जाता है। तरंग और समुद्र के बीच कौन प्रभेद कर सकता है? अतएव यह समुदाय जगत् एक स्वरूप हुआ। जितना भी पार्थक्य है वह सब नामरूप के ही कारण है। जिस प्रकार सूर्य लाखों जलकणो पर प्रतिबिम्बित होकर प्रत्येक जलकण के ऊपर सूर्य की एक सम्पूर्ण प्रतिकृति की सृष्टि कर देता है उसी प्रकार वही एक आत्मा, वही एक सत्ता विभिन्न वस्तुओ में प्रतिबिम्बित होकर नाना रूप मे दिखाई पड़ता है। किन्तु वास्तव मे वह एक है। वास्तव मे ‘मै’ अथवा ‘तुम’ नामक कुछ नहीं है—सब एक है। चाहे कहो—सभी मै हूँ, या कहो—सभी तुम हो। किन्तु यह द्वैतज्ञान बिलकुल मिथ्या है, और समुदाय जगत् इसी द्वैतज्ञान का फल है। जब विवेक उदय होने पर मनुष्य देख पाता है कि दो वस्तुएँ नहीं है, एक ही वस्तु है, तब उसे बोध होता है कि वही स्वयं यह अनन्त ब्रह्माण्ड स्वरूप हो गया है। मैं ही यह परिवर्तनशील जगत् हूँ, और मै ही अपरिणामी, निर्गुण, नित्यपूर्ण नित्यानन्दमय हूँ।

अतएव नित्यशुद्ध, नित्य, पूर्ण अपरिणामी अपरिवर्तनीय एक आत्मा है; उसका परिणाम कभी नहीं होता, और ये सब विभिन्न परिणाम उसी एकमात्र आत्मा मे ही प्रतीत होते हैं। उसके ऊपर नामरूप

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ८३

ने ये सब विभिन्न स्वप्नचित्र अङ्कित किये हैं। आकृति ने ही तरंग को समुद्र से पृथक् किया है। मान लो कि तरंगें मिल गईं, तब क्या यह आकृति रहेगी ? नहीं, वह बिलकुल ही चली जायगी । तरंग का अस्तित्व पूर्ण रूप से समुद्र के अस्तित्व के ऊपर निर्भर रहता है; किन्तु समुद्र का अस्तित्व तरंग के अस्तित्व के ऊपर निर्भर नहीं रहता। जब तक तरंग रहती है तब तक रूप भी रहता है, किन्तु तरंग की निवृत्ति होने पर वह रूप नहीं रह सकता। इसी नाम-रूप को माया कहते हैं। यह माया ही भिन्न व्यक्तियों का सृजन करके एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से पृथक्-बोध करा रही है। किन्तु वास्तव में इसका अस्तित्व नहीं है। माया का अस्तित्व है यह नहीं कहा जा सकता। रूप या आकृति का अस्तित्व है यह नहीं कहा जा सकता, कारण, वह तो दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर रहती है। और वह नहीं है यह भी नहीं कहा जा सकता, कारण, उसी ने तो यह सब भेद उत्पन्न किया है। अद्वैतवादियों के मत में यही माया या अज्ञान या नामरूप अथवा योरपीय लोगों के मत में देश-काल-निमित्त ही इसी एक अनन्त सत्ता से इस विभिन्नरूप जगत् की सत्ता दिखा रहे हैं। परमार्थतः यह जगत् एक अखण्ड स्वरूप है; जब तक कोई दो वस्तुओं की कल्पना करता है तब तक वह भ्रम में है। जब वह जान जाता है कि एक मात्र सत्ता है तभी वह यथार्थ को जानता है। जितना ही समय बीतता जाता है उतना ही हमारे निकट यह सत्य प्रमाणित होता जाता है। क्या जड़ जगत् में, क्या मनोजगत् में और क्या अध्यात्म जगत् में, सभी जगह यह सत्य प्रमाणित हो रहा है। अब प्रमाणित हो गया है कि तुम, मैं, सूर्य, चन्द्र, तारे—ये सभी एक जड़ समुद्र के विभिन्न अंशों के नाम मात्र हैं। इस जड़राशि का क्रमागत परिणाम हो रहा है। जो शक्ति का कण कुछ मास