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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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५२ ज्ञानयोग

परिवर्तन हो, यह असम्भव बात है। यह कभी नहीं हो सकता। शरीर के हिसाब से तुम और मै एक स्थान से दूसरे स्थान को जा सकते है, जगत् का प्रत्येक अणु-परमाणु ही नित्य परिणामशील है; किन्तु जगत् को समष्टि रूप मे लेने पर उसमें गति या परिवर्तन असम्भव है। गति सब जगह सापेक्ष होती है। मै जब एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता हूँ तब एक मेज़ अथवा और किसी वस्तु के साथ तुलना करके देखना होगा; जगत् का कोई परमाणु दूसरे किसी परमाणु के साथ तुलना करके ही परिणाम को प्राप्त हो सकता है; किन्तु सम्पूर्ण जगत् को समष्टि रूप मे लेने पर किसके साथ तुलना करके उसका स्थान परिवर्तन होगा ? इस समष्टि के अतिरिक्त तो और कुछ है नहीं। अतएव यह अनन्त—एकमेवाद्वितीयम्, अपरिणामी, अचल और पूर्ण है और यही पारमार्थिक सत्ता है। इसलिये सर्वव्यापी के भीतर ही सत्य है, सान्त के भीतर नहीं। यह धारणा कि मैं एक क्षुद्र, सान्त, सदा परिणामी जीव हूँ कितनी ही आराम देनेवाली क्यों न हों, फिर भी यह एक पुराना भ्रमज्ञान ही है। यदि किसी से कहो कि—'तुम सर्वव्यापी अनन्त पुरुष हो।' तो वह डर जायगा। सब के भीतर बैठ कर तुम कार्य कर रहे हो, सब पैरो के द्वारा तुम चल रहे हो, सब मुखों से तुम बातचीत कर रहे हो, सब नासिकाओ के द्वारा तुम श्वास-प्रश्वास के कार्य को चला रहे हो—किसी से यह सब कहने से वह डर जाता है। वह तुमसे बार बार कहेगा यह 'अहं' ज्ञान कभी नहीं जायगा। लोगो का यह 'मै' कौन सा है, यह तो मै देख ही नहीं पाता हूँ। देख पाता तो सुखी हो जाता।

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छोटे बालक के मूँछें नहीं होतीं। बड़े होने पर उसके दाढ़ी मूँछ निकल आती है । यदि 'अहं' शरीर मे रहता है तब तो बालक का 'अहं' नष्ट हो गया । यदि 'अहं' शरीरगत होता तब हमारी एक आँख अथवा हाथ टूट जाने पर 'अहं' भी नष्ट हो जाता । शराबी का शराब छोड़ना ठीक नही, क्योकि इससे उसका 'अह' नष्ट हो जायगा ! चोर का साधु बनना भी ठीक नही, क्योकि इससे उसका 'अहं' भी छूट जायगा। इसी भय से किसी को भी अपना व्यसन छोड़ना उचित नहीं। अनन्त को छोड़कर और किसी मे 'अहं' है ही नही। केवल इस अनन्त का ही परिवर्तन नही होता, और सभी का क्रमागत परिणाम होता है। 'अहं' भाव स्मृति मे भी नहीं है। स्मृति मे यदि 'अहं' होता तो मस्तिष्क मे गहरी चोट लगने के कारण स्मृतिलोप हो जाने पर वह 'अह' भी नष्ट हो जाता और हमारा बिल्कुल ही लोप हो जाता ! प्रारम्भिक बचपन के दो तीन वर्ष का मुझे कोई स्मरण नहीं; यदि स्मृति के ऊपर मेरा अस्तित्व निर्भर करता होता तो ये दो-तीन वर्ष मेरा अस्तित्व ही नहीं था—कहना ही पड़ेगा। तब तो मेरे जीवन का जो अंश मुझे स्मरण नहीं, उस समय मैं जीवित नही था, यह कहना ही पड़ेगा। अवश्य ही यहाँ 'अह' का बहुत ही सङ्कीर्ण अर्थ लिया गया है। हम अभी तक 'मै' नहीं हैं। हम इसी 'मैं' को प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे है—यह अनन्त है, यही मनुष्य का प्रकृत स्वरूप है। जिनका जीवन सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त किये हुये है वे ही जीवित है, और हम जितना ही अपने जीवन को शरीर रूपी छोटे-छोटे सान्त पदार्थों मे बद्ध करके रखेगे उतना ही हम मृत्यु की ओर अग्रसर होगे। हमारा जीवन जिस मुहूर्त मे समस्त जगत् मे व्याप्त रहता है, जिस क्षण से वह दूसरे मे व्याप्त रहता है, उसी मुहूर्त

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मे हम जीवित है, और जिस समय हम इस क्षुद्र जीवन मे अपने को बद्ध करके रखते है उसी मुहूर्त में मृत्यु है एवं इसी कारण हमें मृत्युभय होता है। मृत्युभय को तभी जीता जा सकता है जब मनुष्य यह समझले कि जब तक जगत् मे एक भी जीवन शेष है तब तक वह भी जीवित है। इस प्रकार के व्यक्तियो को ऐसी उपलब्धि होती है कि, “मै सब वस्तुओ मे, सब देहो मे वर्तमान हूँ। सब जन्तुओं मे मै वर्तमान हूँ। मै ही यह जगत् हूँ, सम्पूर्ण जगत् ही मेरा शरीर है। जितने दिन एक भी परमाणु शेष है उतने दिन मेरी मृत्यु की सम्भावना ही क्या है? कौन कहता है कि मेरी मृत्यु होगी?”-ऐसा ज्ञान हो जाने पर ऐसे लोग निर्भय हो जाते हैं, ऐसे ही समय निर्भीक अवस्था आ जाती है। नियतपरिणामशील छोटी-छोटी वस्तुओ मे अविनाशत्व है यह कहना मूर्खता है। एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक ने कहा है कि आत्मा अनन्त है इसलिये आत्मा ही ‘अहं’ हो सकता है। अनन्त का भाग नहीं किया जा सकता, अनन्त को खण्ड-खण्ड नहीं किया जा सकता। यही एक अविभक्त, समष्टिरूप अनन्त आत्मा है, वही मनुष्य का यथार्थ ‘मै’ है, वही ‘प्रकृत मनुष्य’ है। मनुष्य के नाम से जिसको हम जानते है वह केवल इस ‘मै’ को व्यक्त जगत् मे प्रकाशित करने की चेष्टा का फल मात्र है; और आत्मा मे कभी ‘क्रमविकास’ नहीं रह सकता। यह जो सब परिवर्तन हो रहा है, बुरा-भला हो रहा है, पशु मनुष्य हो रहा है, यह सब कभी आत्मा मे नहीं होता। कल्पना करो कि एक पर्दा मेरे सामने है और उसमे एक छोटा सा छिद्र है; इसके भीतर से मै केवल कुछ चेहरे देख पा रहा हूँ। यह छिद्र जितना बड़ा होता जाता है उतना ही अधिक सामने का दृश्य मेरे सम्मुख प्रकाशित होता जाता है

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और जब यह छिद्र सम्पूर्ण पर्दे को व्याप्त कर लेता है तब मै तुम सब को स्पष्ट देख पाता हूँ। यहाँ पर तुम्हारे अन्दर कोई परिवर्तन नहीं हुआ; तुम जो थे, वही हो। केवल छिद्र का क्रमविकास होता रहा, और उसके साथ साथ तुम्हारा प्रकाश होता रहा। आत्मा के सम्बन्ध में भी यही बात है। तुम मुक्त स्वभाव और पूर्ण ही हो। इसके लिये चेष्टा करनी नही होगी। धर्म, ईश्वर या परकाल, यह सब धारणा कहाँ से आई? मनुष्य ‘ईश्वर, ईश्वर’ करता क्यो घूमता फिरता है? सभी जातियों, सभी समाजो मे मनुष्य क्यों पूर्ण आदर्श का अन्वेषण करता फिरता है चाहे वह आदर्श मनुष्य में हो या ईश्वर मे यां अन्य किसी वस्तु मे? इसका कारण यह है कि वह तुम्हारे भीतर ही वर्तमान है। तुम्हारा अपना ही हृदय धक-धक करता है, तुम सोचते हो, वाहर कोई वस्तु यह शब्द कर रही है। तुम्हारी आत्मा के अन्दर बैठा ईश्वर ही तुम्हे अपना अनुसन्धान करने को—अपनी उपलब्धि करने को प्रेरित कर रहा है।

यहाँ, वहाँ, मन्दिर मे, गिरजाघर मे, स्वर्ग-मर्त्य मे, नाना स्थानो मे नाना उपायो से अन्वेषण करने के वाद अन्त मे हमने जहाँ से आरम्भ किया था—अर्थात् हमारी आत्मा में ही हम वृत्ताकार घूम कर वापस आते है और देखते हैं कि जिसकी हम समस्त जगत् मे खोज करते थे, जिसके लिये हमने मन्दिरों, गिरजाओ मे जाकर कातर होकर प्रार्थनाये की, आँसू वहाये, जिसको हम सुदूर आकाश मे मेघराशि के पीछे छिपा हुआ अव्यक्त रहस्यमय समझते रहे, वह हमारे निकट से भी निकट है, प्राण का प्राण है, वही हमारा शरीर है, वही हमारा आत्मा है—तुम ही ‘मै’ हो, मै ही ‘तुम’ हूँ। यही तुम्हारा स्वरूप

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है—इसीका प्रकाश करो। तुम्हें पवित्र होना नहीं पड़ेगा—तुम पवित्र स्वरूप ही हो। तुम्हें पूर्ण स्वरूप होना नहीं पड़ेगा—तुम पूर्ण स्वरूप ही हो। समस्त प्रकृति ही पर्दे के समान अपने अन्दर रहने वाले सत्य को ढांके रहती है। तुम जो कुछ भी अच्छा विचार या अच्छा कार्य करते हो वह मानों केवल उस आवरण को धीरे-धीरे छिन्न करते हो और वही मानों प्रकृति के अन्दर स्थित शुद्ध स्वरूप अनन्त ईश्वर प्रकाशित हो रहा है। यही मनुष्य का सारा इतिहास है। यही आवरण जितना ही सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है, उतना ही प्रकृति के अन्दर स्थित प्रकाश भी अपने स्वभाव के अनुसार ही क्रमशः अधिकाधिक दीप्त होता जाता है, क्योंकि उसका स्वभाव ही इसी प्रकार दीप्त होना है। उसको जाना नहीं जा सकता, हम सब उसको जानने की वृथा ही चेष्टा करते हैं। यदि वह ज्ञेय होता तो उसका स्वभाव ही बदल जाता, कारण वह नित्यज्ञाता है। और ज्ञान तो ससीम है; किसी वस्तु का ज्ञान-लाभ करने के लिये उसकी ज्ञेय वस्तु के रूप में, विषय के रूप में चिन्ता करनी होती है। वह तो सकल वस्तुओं का ज्ञाता स्वरूप है, सब विषयो का विषयी स्वरूप है, इस विश्वब्रह्माण्ड का साक्षी स्वरूप है, तुम्हारा ही आत्मा स्वरूप है। ज्ञान तो मानो एक नीचे की अवस्था है—केवल एक अवनत भाव है। हम ही वह आत्मा हैं, फिर इसे हम किस प्रकार जानेंगे? प्रत्येक व्यक्ति वह आत्मा है और विभिन्न उपायो से इसी आत्मा को जीवन मे प्रकाशित करने की सभी चेष्टा कर रहे है; यदि ऐसा न होता तो ये सब नीतिप्रणालियाँ कहाँ से आतीं? सभी नीति-प्रणालियो का तात्पर्य क्या है? सभी नीतिप्रणालियों में एक ही भाव भिन्न-भिन्न रूप से प्रकाशित हुआ है—दूसरों का उपकार करना।

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मानवजाति के समस्त सत्कर्मों की मूल अभिसन्धि है—मनुष्य, जन्तु आदि सभी के प्रति दया। किन्तु ये सब ‘मै ही जगत् हूँ, यह जगत् एक अखण्ड स्वरूप है,’ इसी सनातन सत्य के विभिन्न भाव मात्र है। यदि ऐसा नहीं हो तो दूसरो का हित करने में क्या युक्ति है? मैं क्यों दूसरों का उपकार करूँ? परोपकार करने को मुझे कौन बाध्य करता है? सब जगह समदर्शन से उत्पन्न जो सहानुभूति का भाव है उसी से तो यह बात हुई। अत्यन्त कठोर अन्तःकरण भी कभी-कभी दूसरो के प्रति सहानुभूति से भर जाता है। और तो क्या, जो व्यक्ति 'यह आपातप्रतीयमान ( Apparent ) ‘ अहं ’ वास्तव मे भ्रम-मात्र है,’ ‘इस भ्रमात्मक ‘ अह ’ में आसक्त रहना अत्यन्त नीच कार्य है’—ये सब बाते सुनकर भयभीत हो जाता है—वही व्यक्ति तुमसे कहेगा कि सम्पूर्ण आत्मत्याग ही सब नीतियों की भित्ति है। किन्तु पूर्ण आत्मत्याग क्या है? सम्पूर्ण आत्मत्याग हो जाने पर शेष क्या रहेगा? आत्मत्याग का अर्थ है इसी आपातप्रतीयमान ‘ अहं ’ का त्याग, सब प्रकार की स्वार्थपरता का त्याग। यह अहंकार और ममता पूर्व कुसंस्कारों के फल स्वरूप है और जितना ही इस ‘ अहं ’ का त्याग होता जाता है उतना ही आत्मा अपने नित्य स्वरूप में, अपनी पूर्ण महिमा में प्रकाशित होता है। यही वास्तविक आत्मत्याग है, यही समस्त नैतिक शिक्षा की भित्ति है, केन्द्र है। मनुष्य इसको जाने या न जाने, समस्त जगत् धीरे-धीरे इसी दिशा मे जा रहा है, अल्पाधिक परिमाण मे इसीका अभ्यास कर रहा है। केवल, अधिकांश लोग इसे अज्ञात भाव से ही कर रहे है। वे इसे ज्ञात भाव से करे। यह प्रकृत आत्मा नहीं है यह समझ कर वे इस त्याग-यज्ञ को करे। यह व्यवहारिक जीव ससीम जगत् के भीतर आवद्ध है। इस समय जिसको

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मनुष्य नाम से पुकारा जाता है वह इसी जगत् की अतीत अनन्त सत्ता का सामान्य आभास मात्र है, उसी सर्वस्वरूप अनन्त अग्नि का एक कण मात्र है। किन्तु वह अनन्त ही तो उसका वास्तविक स्वरूप है।

इस ज्ञान का फल—इस ज्ञान की उपकारिता क्या है? आज-कल सभी विषयो को उनकी इस उपकारिता से ही नापा जाता है। अर्थात् मोटी बात यो है कि इससे कितने रुपये, कितने आने और कितने पैसो का लाभ है? किन्तु लोगो को इस प्रकार प्रश्न करने का क्या अधिकार है? क्या सत्य को भी उपकार या धन के मापदण्ड से नापा जायगा? मान लो कि इससे कोई लाभ नही होता तो क्या यह सत्य कुछ कम सत्य हो जायगा? उपकार अथवा प्रयोजन सत्य का निर्णायक कभी नही हो सकता (Bentham's Utilitarianism and Jame's Pragmatism)। जो भी हो, इस ज्ञान मे बड़ा उपकार तथा प्रयोजन भी है। हम देखते है, सब लोग सुख की खोज करते है; किन्तु अधिकांश लोग नश्वर मिथ्या वस्तुओं मे उसको ढूँढ़ते फिरते है। इन्द्रियो मे कभी किसी को सुख नही मिलता। सुख तो केवल आत्मा मे ही मिलता है। अतएव आत्मा मे इस सुख की प्राप्ति ही मनुष्य का सबसे बड़ा प्रयोजन है। और एक बात यह है कि अज्ञान ही सब दुःखो का कारण है, और मेरी समझ मे सब से बड़ा अज्ञान यही है कि जो अनन्त स्वरूप है वह अपने को सान्त मान कर रोता है; समस्त अज्ञान की मूलभित्ति यही है कि अविनाशी, नित्य शुद्ध पूर्ण आत्मा होते हुए भी हम सोचते हैं कि हम छोटे मन, छोटे छोटे देह मात्र हैं; यही समस्त स्वार्थपरता का मूल है। जब ही मै अपने को एक क्षुद्र देह समझ कर विवेचना करता,

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हूँ तभी मैं उसकी—जगत् के अन्यान्य शरीरो के सुख-दुःख की ओर दृष्टि बिना डाले ही—रक्षा करने की तथा उसका सौन्दर्य सम्पादन करने की इच्छा करता हूँ। उस समय तुम और मै भिन्न हो जाता हूँ। और जब ही यह भेद-ज्ञान आता है तभी यह सब प्रकार के अमंगल का द्वार खोल देता है और सब प्रकार के दुखों की उत्पत्ति करता है। अतः पूर्वोक्त ज्ञानलाभ से यह लाभ होगा कि आजकल की मनुष्य-जाति का एक बहुत छोटा अंश भी यदि क्षुद्र भाव का त्याग कर सके तो कल ही यह संसार स्वर्गरूप मे परिणत हो जायगा, किन्तु नाना प्रकार के यन्त्रो के तथा बाह्य जगत् सम्बन्धी ज्ञान की उन्नति से यह कभी नही हो सकता। जिस प्रकार अग्नि मे तेल डालने से अग्निशिखा और भी वर्धित होती है उसी प्रकार इन सब वस्तुओ से दुःखों की ही वृद्धि होती है। आत्मज्ञान के अतिरिक्त जितना भी भौतिक ज्ञान उपार्जित किया जाता है वह केवल अग्नि मे घृताहुति मात्र है। इससे केवल स्वार्थपर लोगों के हाथों मे दूसरों का कुछ लेने के लिये, दूसरों के लिये अपना जीवन बिना दिये दूसरो के कन्धो पर बैठ कर खाने के लिये एक और यंत्र एक और सुविधा मात्र आजाती है।

एक और प्रश्न है—क्या इसे कार्य रूप मे परिणत करना सम्भव है ? वर्तमान समाज मे क्या इसको कार्य रूप मे परिणत किया जा सकता है ? इसका उत्तर यही है कि सत्य—प्राचीन अथवा आधुनिक किसी समाज का भी सम्मान नही करता। समाज को ही सत्य का सम्मान करना पड़ेगा, अन्यथा ध्वंस अवश्यम्भावी है । सत्य ही समस्त प्राणियो तथा समाज का मूल आधार है, अतः सत्य कभी

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भी समाज के अनुसार अपना गठन नहीं करेगा। यदि निःस्वार्थपरता के समान महान सत्य समाज में कार्य रूप मे परिणत नहीं किया जा सकता तो ऐसे समाज को छोड़ कर वन मे जाकर बसना ही अच्छा है। इसीका नाम साहस है। साहस दो प्रकार का होता है। एक साहस होता है तोप के मुँह मे दौड़ पड़ना। यदि यही वास्तविक साहस होता तो सिंह आदि मनुष्य से श्रेष्ठ होते। किन्तु एक और साहस होता है जिसे सात्त्विक साहस कह कर पुकार सकते है। एक बार एक दिग्विजयी सम्राट भारतवर्ष मे आया। उसके गुरु ने उसे भारतीय साधुओं से साक्षात्कार करने का आदेश दिया था। बहुत खोज करने के बाद उसने देखा कि एक वृद्ध साधु एक पत्थर के ऊपर बैठे है। सम्राट को उनके साथ कुछ देर बातचीत करने से बड़ा सन्तोष हुआ। अतएव उसने साधु को अपने साथ देश ले जाने की इच्छा प्रकट की। साधु ने इसे स्वीकार नही किया और कहा—“मै इसी वन मे बड़े आनन्द मे हूँ।” सम्राट बोला—“मैं समस्त पृथिवी का सम्राट हूँ। मै आपको असीम ऐश्वर्य तथा उच्च पद-मर्यादा दूँगा।” साधु बोले—“ऐश्वर्य, पदमर्यादा, किसी मे भी मेरी आकांक्षा नहीं है।” तब सम्राट ने कहा—“आप यदि मेरे साथ नही जायेगे तो मैं आपका विनाश कर दूँगा।” इस पर साधु बहुत हँसे और बोले—“महाराज, तुमने जितनी बाते कही, उनमे यही सब से अधिक अज्ञानपूर्ण मालूम होती है। क्या तुम मेरा संहार कर सकते हो ? सूर्य मुझे सुखा नहीं सकता, अग्नि मुझे जला नही सकती, कोई यंत्र भी मेरा संहार नहीं कर सकता, कारण कि मैं जन्म रहित अविनाशी, नित्यविद्यमान, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान आत्मा हूँ।” यह एक अन्य प्रकार की साहसिकता है। सन १८५७ ई. मे सिपाही-विद्रोह

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के समय एक मुसलमान सिपाही ने एक संन्यासी महात्मा को तलवार से भोंक दिया। हिन्दू विद्रोहियों ने इस मुसलमान को स्वामीजी के पास लाकर कहा—"आप कहे तो इसकी हत्या कर दे हम?" स्वामीजी ने उनकी ओर मुँह फिरा कर कहा—"भाई, तुम्हीं वह हो, तुम्हीं वह हो।" यही कहते-कहते उन्होंने शरीर छोड़ दिया। यह भी एक प्रकार की साहसिकता है। यदि तुम सत्य के आदर्श पर समाज का संगठन नही कर सकते, यदि तुम इस प्रकार समाज-संगठन नहीं कर सकते कि जिसमे वह सर्वोच्च सत्य-स्थान पा सके तब फिर तुम अपने बाहुबल पर क्या अभिमान करते हो? तब फिर तुम अपनी सारी पाश्चात्य संस्थाओं का क्या अभिमान करते हो? अपनी महानता तथा श्रेष्ठता का तुम क्या गौरव करते हो, यदि तुम दिन-रात यही कहते रहते हो कि, "इसका कार्य मे परिणत करना असम्भव है।" पैसा-कौड़ी को छोड़ कर क्या और कुछ भी करने योग्य नहीं है? यदि यही है तो अपने समाज पर इतना अहंकार क्यो करते हो? वही समाज सर्वश्रेष्ठ है जहाँ सर्वोच्च सत्य को कार्य मे परिणत किया जा सकता है—यही मेरा मत है। और यदि समाज इस समय उच्चतम सत्य को स्थान देने मे समर्थ नही है तो उसे इस योग्य बनाओ। उसको इस योग्य बनाओ और जितनी शीघ्र तुम इस कार्य मे सफल होगे उतना ही अच्छा। हे नरनारिगण! आत्मा के सम्बन्ध मे जाग्रत होओ, सत्य मे विश्वास करने का साहस करो, सत्य के अभ्यास का साहस करो। संसार मे कितने ही साहसी नरनारियो की आवश्यकता है। साहसी होना वडा कठिन है। शारीरिक साहस मे तो व्याघ्र मनुष्य से श्रेष्ठ है, उसके स्वभाव मे ही इस प्रकार की साहसिकता है। बल्कि इस

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विषय मे तो चींटी अन्य जन्तुओ से श्रेष्ठ है। परन्तु इस शारीरिक साहसिकता की बात क्यो करते हो ? उसी साहस का अभ्यास करो जो मृत्यु के समक्ष भयभीत नहीं होता, जो मृत्यु का स्वागत कर सकता है, जिससे मनुष्य जान सके—कि वह आत्मा है, और समस्त जगत् म कोई भी अस्त्र ऐसा नही जो उसे संहार कर सके, सारे शस्त्र मिल कर भी उसका संहार नहीं कर सकते, जगत् की समस्त अग्नि भी उसे दग्ध नहीं कर सकती—जो साहसिकता सत्य को जानने का साहस करती है और जीवन मे उस सत्य को दिखा सकती है, ऐसी साहसिकता जिसमे है वही व्यक्ति मुक्त पुरुष है, वही व्यक्ति वास्तव मे आत्मस्वरूप हो गया। यह इसी समाज में—प्रत्येक समाज मे—अभ्यास करना होगा। 'आत्मा के सम्बन्ध मे पहले श्रवण, फिर मनन, उसके बाद निदिध्यासन करना होगा।'

आज कल के समाज मे एक बात देखी जाती है—कार्य करने मे अधिक ज़ोर लगाना और सब प्रकार के मनन, ध्यान, धारणा आदि पर बिल्कुल ध्यान न देना। अवश्य ही कार्य अच्छा हो सकता है. किन्तु वह भी तो चिन्ता से ही उत्पन्न होता है। मन के भीतर जो छोटी-छोटी शक्तियो का विकास होता रहता है वही जब शरीर द्वारा अनुष्ठित होता है तब उसी को कार्य कहते हैं। बिना चिन्ता के कोई कार्य नहीं हो सकता। मस्तिष्क को ऊँची-ऊँची चिन्ताओ, ऊँचे-ऊँचे आदर्शों से भर लो, उन्हीं को दिन-रात मन के सम्मुख स्थापित करके रक्खो; ऐसा होने पर इन्हीं विचारों से बड़े-बड़े कार्य होगे। अपवित्रता के सम्बन्ध मे कोई बात मत कहो किन्तु मन से कहो कि 'मै शुद्ध पवित्र स्वरूप हूँ। हम क्षुद्र हैं, हमने जन्म लिया, हम मरेंगे,

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इन्हीं चिन्ताओं में हमने अपने आप को एकदम अभिभूत कर रक्खा है, और इसीलिये हम सर्वदा एक प्रकार के भय से काँपते हैं।

एक सिंहनी जिसका प्रसवकाल निकट था, एक बार अपने शिकार की खोज मे बाहर निकली। उसने दूर पर भेड़ों के एक झुण्ड को चरते देख कर उन पर आक्रमण करने के लिये जैसे ही छलाँग मारी वैसे ही उसके प्राणपखेरू उड़ गये और एक मातृहीन सिंह के बच्चे ने जन्म लिया। भेडो ने उस सिंह के बच्चे की देखरेख प्रारम्भ कर दी और वह भेड़ो के बच्चो के साथ साथ बड़ा होने लगा, भेड़ो की भाँति घास-पात खाकर प्राण-धारण करने लगा, भेड़ो की भाँति 'मे-मे' भी करने लगा। यद्यपि वह ठीक एक सिंह के समान हो उठा था, फिर भी वह अपने को भेड समझता था। इसी प्रकार दिन बीत रहे थे कि एक दिन एक बड़ा भारी सिंह शिकार के लिये उधर आ निकला, किन्तु उसे यह देख कर बडा आश्चर्य हुआ कि भेड़ों के बीच मे एक सिंह भी है और भेड़ों की भाँति ही वह विपत्ति आने की सम्भावना मात्र से ही भाग रहा है। तब सिंह उसके पास जाकर-‘वह सिंह है, भेड़ नहीं’ यह समझाने की चेष्टा करने लगा, किन्तु जैसे ही वह आगे बढ़ा वैसे ही भेड़ों का झुण्ड भागने लगा और उसके साथ-साथ वह 'मेष-सिंह' भी भागने लगा। जो हो उसने उस मेष-सिंह को अपने यथार्थ स्वरूप को समझाने का सकल्प नहीं छोड़ा। वह लक्ष्य करने लगा कि भेड-सिंह कहाँ रहता है, क्या करता है। एक दिन उसने देखा कि वह एक जगह पड़ा सो रहा है। देखते ही वह उसके ऊपर कूद कर जा पहुँचा और बोला—“अरे, तुम भेड़ों के साथ रह कर अपना स्वभाव किस प्रकार भूल गये ?

६४ ज्ञानयोग

६४ ज्ञानयोग

तुम तो भेड़ नहीं हो, तुम सिंह हो।” मेष-सिंह बोल उठा—“क्या कह रहे हो? मै भेड़ हूँ, सिंह कैसे हो सकता हूँ?” उसे किसी प्रकार विश्वास नहीं हुआ कि वह सिंह है, और वह भेड़ों की भाँति चीत्कार करने लगा। तब सिंह उसे उठा कर एक सरोवर के किनारे ले गया और बोला—“यह देखो अपना प्रतिबिम्ब, यह देखो मेरा प्रतिबिम्ब।” और तब वह इन दोनों की तुलना करने लगा। वह एक बार सिंह की ओर, और एक बार अपने प्रतिबिम्ब की ओर ध्यान से देखने लगा। उस समय क्षण भर मे ही उसका यह ज्ञान जाग गया कि ‘सचमुच, मै तो सिंह ही हूँ।’ तब वह सिंहगर्जना करने लगा और उसका भेड़ों का सा चीत्कार न जाने कहाँ चला गया! तुम सब सिंह स्वरूप हो, तुम आत्मा हो, शुद्धस्वरूप, अनन्त और पूर्ण। जगत् की महाशक्ति तुम्हारे भीतर है। “हे सखा, क्यो रोदन करते हो? जन्म-मृत्यु तुम्हारा भी नहीं है, मेरा भी नही है। क्यों रोते हो? तुम्हे रोग, दुःख कुछ भी नहीं है, तुम अनन्त आकाश स्वरूप हो जिसके ऊपर नाना प्रकार के मेघ आते है और कुछ देर खेल कर न जाने कहाँ अन्तर्हित हो जाते है; किन्तु आकाश जैसा पहले नीला था वैसा ही नीला रह जाता है।” इसी प्रकार के ज्ञान का अभ्यास करना होगा। हम जगत् मे पाप-ताप क्यों देखते है? कारण, हम स्वय ही असत् है। एक मार्ग मे एक ठूँठ खड़ा था। एक चोर उधर से जा रहा था, उसने समझा यह कोई पहरेवाला है। नायक ने समझा, वह उसकी नायिका है। एक बच्चे ने जब उसे देखा तो भूत समझ कर चीत्कार करने लगा। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने इस प्रकार यद्यपि उसे भिन्न-भिन्न रूपों मे देखा, तथापि वह एक ठूँठ के अतिरिक्त और कुछ भी नही था।

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हम स्वयं जैसे होते है जगत् को वैसा ही देखते है। एक मेज़ पर एक मोहर की थैली रख दो और सोचो कि यहाँ पर एक बच्चा बैठा है। एक चोर ने आकर उस थैली को ले लिया। क्या बच्चा समझेगा कि चोरी हो गई ? हमारे भीतर जो है वही हम बाहर भी देखते हैं। बच्चे के मन में चोर नहीं था, अतएव उसने चोर को नहीं देखा। सब प्रकार के ज्ञान के सम्बन्ध मे ऐसा ही होता है। जगत् के पाप, अत्याचार की बात मत कहना। किन्तु तुम्हे जगत् मे अब भी जो पाप देखना पड़ता है उसके लिये रोदन करो। अपने लिये रोओ कि तुम्हें अब भी सर्वत्र पाप देखना पड़ता है। और यदि तुम जगत् का उपकार करना चाहते हो तो जगत् के ऊपर दोषारोपण करना छोड़ दो। उसे और भी दुर्बल मत करो। यह सब पाप, दुःख आदि क्या हैं ? यह सब तो दुर्बलता का ही फल है। लोग बचपन से ही शिक्षा पाते है कि वे दुर्बल है, वे पापी है। इस प्रकार की शिक्षा से जगत् दिन पर दिन दुर्बल होता जा रहा है। उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की सन्तान हैं—और तो क्या, जिसके भीतर आत्मा का प्रकाश अति क्षीण है उसे भी यही सिखाओ। बाल्य-काल से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार की चिन्ताएँ प्रविष्ट कर दो जिनसे कि उनकी यथार्थ सहायता हो सके, जो उनको सबल बनाये, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो, जिससे दुर्बलता तथा अवसादकारक चिन्ता उनके मस्तिष्क मे प्रवेश ही न करे। सच्चिन्ता के स्रोत मे शरीर को डुबा दो, अपने मन से सर्वदा कहो—'मै ही वह हूँ, मै ही वह हूँ।' तुम्हारे मन में दिन रात यह बात संगीत की भाँति बजती रहे, और मृत्यु के समय भी 'सोऽहम्, सोऽहम्' बोलते हुए मरो। यही सत्य है—जगत् की अनन्त शक्ति

६६ ज्ञानयोग

६६ ज्ञानयोग

तुम्हारे भीतर है। जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढके रखता है, उसे भगा दो। साहसी बनो। सत्य को जान कर उसे जीवन मे परिणत करो, चरम लक्ष्य बहुत दूर हो सकता है, किन्तु 'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत।'

४. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

(न्यूयार्क में दिया हुआ भाषण)

हम यहाँ खडे है परन्तु हमारी दृष्टि दूर, बहुत दूर—अनेक समय, कोसो दूर चली जाती है। जब से मनुष्य ने चिन्ता करना आरम्भ किया तभी से उसको यह आदत रही है। मनुष्य सदा ही वर्तमान से बाहर देखने की चेष्टा करता है, वह जानना चाहता है कि इस शरीर के नष्ट होने के बाद वह कहाँ चला जाता है। इसी रहस्य को उद्घाटित करने के लिये अनेक मतो का प्रचार हुआ; सैकड़ों मतो की स्थापना हुई, और सैकडो मत खण्डित होकर छोड़ भी दिये गये; और जितने दिन मनुष्य इस जगत् मे रहेगा, जितने दिन वह चिन्ता करता रहेगा उतने दिन ऐसे ही चलेगा। इन सब मतो में ही कुछ न कुछ सत्य है। और इन्ही मे बहुतसा असत्य भी है। इस सम्बन्ध मे भारत मे जो अनुसन्धान हुआ है उसीका सार, उसीका फल मै आपके सामने रखने की चेष्टा करूँगा। भारतीय दार्शनिकों के इन सब मतों का समन्वय करने तथा यदि हो सका तो उसके साथ आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों का भी समन्वय करने की चेष्टा करूँगा।

वेदान्त-दर्शन का एक ही उद्देश्य है—एकत्व का अनुसन्धान या अन्वेषण। हिन्दू लोग विशेष के पीछे नहीं दौड़ते, वे सदा ही सामान्य वस्तु का—नहीं नहीं, सर्वव्यापी सार्वभौमिक वस्तु का

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ज्ञानयोग

अन्वेषण करते हैं। हम देखते हैं कि उन्होंने वार वार इसी एक सत्य का अनुसन्धान किया है—“ ऐसा कौन सा पदार्थ है जिसके जान लेने से सब कुछ जाना जा सकता है ?” जिस प्रकार मिट्टी के एक ढेले को जान लेने पर जगत् की सारी मिट्टी को जान लिया जाता है उसी प्रकार ऐसी कौनसी वस्तु है जिसे जान कर जगत् की सभी वस्तुये जानी जा सकती हैं ? यही उनका एक मात्र अनुसन्धान है, यही उनकी एकमात्र जिज्ञासा है। उनके मत से समस्त जगत् का विश्लेषण करके उसे एकमात्र ‘आकाश’ में पर्यवसित किया जा सकता है। हम अपने चारो ओर जो कुछ भी देखते हैं, छूते हैं, आस्वादन करते हैं, अधिक क्या, हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं वह सब केवल इसी आकाश का विभिन्न विकास मात्र है। यह आकाश सूक्ष्म और सर्व्वव्यापी है। कठिन, तरल, वाष्पीय, सब पदार्थ, सब प्रकार की आकृतियाँ, शरीर, पृथ्वी, सूर्य्य, चन्द्र, तारा—सब इसी आकाश से उत्पन्न हैं। किस शक्ति ने इस आकाश पर कार्य करके इसमे से जगत् की सृष्टि की ? आकाश के साथ एक सर्व्वव्यापी शक्ति रहती है। जगत् में जितनी भी भिन्न भिन्न शक्तियाँ हैं—आकर्षण, विकर्षण, यहाँ तक कि चिन्ताशक्ति भी, सभी प्राण नामक एक महाशक्ति का विकास मात्र है। इसी प्राण ने आकाश के ऊपर कार्य करके इस जगत्-प्रपञ्च की रचना की है। कल्प के प्रारम्भ में यही प्राण मानो अनन्त आकाश-समुद्र में प्रसुप्त रहता है। प्रारम्भ मे यह आकाश गतिहीन होकर अवस्थित था। बाद में प्राण के प्रभाव से इस आकाश-समुद्र मे गति उत्पन्न होती है। और इस प्राण की जैसे ही गति होती है वैसे ही इस आकाश-समुद्र मे से नाना ब्रह्माण्ड, नाना जगत्, कितने ही सूर्य्य, चन्द्र, तारा—

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप ६९

गण, पृथ्वी, मनुष्य, जन्तु, उद्भिद् और नाना शक्तियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। अतएव हिन्दुओ के मत से सब प्रकार की शक्ति प्राण का और सब प्रकार के दृश्य पदार्थ आकाश का विभिन्न स्वरूप मात्र हैं; कल्पान्त मे सभी घन पदार्थ पिघल जायेंगे, और वह तरल पदार्थ वाष्पीय आकार में परिणत हो जायगा। वह फिर तेज रूप धारण करेगा। अन्त मे सब कुछ जिसमे से उत्पन्न हुआ था उसी आकाश मे विलीन हो जायगा। और आकर्षण, विकर्षण, गति आदि समस्त शक्तियाँ धीरे धीरे मूल प्राण मे परिणत हो जायँगी। उसके बाद जब तक फिर कल्पारम्भ नहीं होता तब तक यह प्राण मानो निद्रित अवस्था मे रहेगा। कल्पारम्भ होने पर वह फिर जाग कर नाना रूपों को प्रकाशित करेगा और कल्पान्त मे सभी कुछ लय हो जायगा। इसी प्रकार वह आता है, जाता है, एक बार पीछे और एक बार आगे—मानो झूल रहा है। आधुनिक विज्ञान की भाषा मे कहेगे कि एक समय वह स्थितिशील (Static) रहता है, फिर गतिशील (Dynamic) हो जाता है; एक समय प्रसुप्त रहता है और फिर क्रियाशील हो जाता है। इसी रूप से अनन्त काल से चला आरहा है।

किन्तु यह विश्लेषण भी अधूरा ही रहा। आधुनिक पदार्थ-विज्ञान ने भी यही तक जान पाया है। इसके ऊपर भौतिक विज्ञान की गति नहीं है। किन्तु इस अनुसन्धान का यहाँ अन्त नहीं हो जाता। हमने अभी तक उस वस्तु को प्राप्त नहीं किया जिसे जान कर सब कुछ जाना जा सके। हमने समस्त जगत् को भूत और शक्ति मे अथवा प्राचीन भारतीय दार्शनिको के शब्दो मे आकाश

७० ज्ञानयोग

७० ज्ञानयोग

और प्राण मे पर्यवसित कर दिया। अब आकाश और प्राण को किसी एक वस्तु मे पर्यवसित करना होगा। इन्हे मन नामक उच्चतर क्रिया-शक्ति मे पर्यवसित किया जा सकता है। महत् अथवा समष्टि चिन्ता-शक्ति से प्राण और आकाश दोनो की उत्पत्ति होती है। चिन्ता-शक्ति ही इन दो शक्तियों के रूप मे विभक्त हो जाती है। प्रारम्भ मे यही सर्वव्यापी मन था। इसी ने परिणत होकर आकाश और प्राण रूप धारण किये और इन्हीं दोनो के सम्मिश्रण से समस्त जगत् बना।

अब हम मनस्तत्व की आलोचना करेगे। मै आपको देख रहा हूँ। आँखे विषय को ग्रहण कर रही है और अनुभूतिजनक स्नायु उसे मस्तिष्क मे प्रेरित कर रहे है। आँखे देखने का साधन नही है, वे केवल बाहरी यन्त्र है, कारण देखने का जो वास्तविक साधन है, जो मस्तिष्क मे विषय-ज्ञान को संवाद ले जाता है, उसको यदि नष्ट कर दिया जाय तब मेरी बीस आँखे रहते हुए भी आप मे से किसी को भी मै नही देख सकूँगा। अक्षिजाल (Retina) के ऊपर पूरा अक्स या प्रतिबिम्ब पड़ सकता है फिर भी तुम सब को मै देख नहीं पाऊँगा। अतएव सिद्ध है कि वास्तविक दर्शनेन्द्रिय इस आँख से पृथक् कोई वस्तु है; प्रकृत चक्षुरिन्द्रिय अवश्य ही चक्षुयन्त्र के पीछे विद्यमान है। सभी प्रकार की विषयानुभूति के सम्बन्ध मे इसी प्रकार समझना चाहिये। नासिका घ्राणेन्द्रिय नही है; वह केवल यन्त्र मात्र है, उसके पीछे घ्राणेन्द्रिय है। प्रत्येक इन्द्रिय के सम्बन्ध मे समझना होगा कि पहले तो इस स्थूल शरीर मे बाह्य यन्त्र लगे हुये है; पीछे किन्तु इसी स्थूल शरीर मे इन्द्रियाँ भी मौजूद हैं। किन्तु इन सब से भी काम नही चलता! मान लीजिये, मै आपसे कुछ कह रहा हूँ-

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप — ७१

और आप बड़े मनोयोग के साथ मेरी बात सुन रहे हैं, इसी समय यहाँ एक घण्टा बजता है; शायद आप उस घण्टे की ध्वनि को नहीं सुन सकेगे। यह शब्द-तरंग आपके कान मे पहुँच कर कान के पर्दे मे लगी, स्नायुओ के द्वारा यह संवाद् मस्तिष्क मे पहुँचा, किन्तु फिर भी आप उसे क्यों नहीं सुन सके ? यदि मस्तिष्क मे संवाद् वहन करने तक ही समस्त श्रवण-प्रक्रिया सम्पूर्ण हो जाती, तो फिर तुम क्यो नही सुन पा सके ? अतएव मालूम हुआ कि सुनने की प्रक्रिया के लिये और भी कुछ आवश्यक है—मन इन्द्रिय से युक्त नहीं था । जिस समय मन इन्द्रियों से पृथक रहता है उस समय इन्द्रियाँ उसके पास जो कुछ भी संवाद लायेगी मन उनको ग्रहण नही करेगा। जब मन उनसे युक्त रहता है तभी वह किसी संवाद को ग्रहण करने मे समर्थ होता है । किन्तु इससे भी विषयानुभूति , पूर्ण नही होगी । बाहरी यन्त्र संवाद् वहन कर सकता है, इन्द्रियगण उसे भीतर ले जा सकती है और मन इन्द्रियों से संयुक्त रह सकता है, फिर भी विषयानुभूति पूर्ण नही होगी । एक वस्तु और आवश्यक है। भीतर से प्रतिक्रिया आवश्यक है। प्रतिक्रिया से ही ज्ञान उत्पन्न होगा । बाहर की वस्तु ने मानों मेरे अन्दर संवाद-प्रवाह प्रेरित किया। मेरे मन ने उसे लेकर बुद्धि के निकट अर्पण कर दिया, बुद्धि ने पहले से बने हुये मन के संस्कारो के अनुसार उसे सजाया और बाहर की ओर प्रतिक्रिया-प्रवाह की प्रेरणा की, इसी प्रतिक्रिया के साथ साथ विषयानुभूति होती है। मन की जो शक्ति इस प्रतिक्रिया की प्रेरणा करती है उसे ' बुद्धि ' कहते है। किन्तु फिर भी अभी विषयानुभूति पूर्ण नहीं हुई। मान लीजिये, एक चित्रक्षेपक यन्त्र है और एक पर्दा है। मै इस पर्दे पर एक चित्र डालने की चेष्टा कर रहा हूँ। तो मै क्या