ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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तुम तो भेड़ नहीं हो, तुम सिंह हो।” मेष-सिंह बोल उठा—“क्या कह रहे हो? मै भेड़ हूँ, सिंह कैसे हो सकता हूँ?” उसे किसी प्रकार विश्वास नहीं हुआ कि वह सिंह है, और वह भेड़ों की भाँति चीत्कार करने लगा। तब सिंह उसे उठा कर एक सरोवर के किनारे ले गया और बोला—“यह देखो अपना प्रतिबिम्ब, यह देखो मेरा प्रतिबिम्ब।” और तब वह इन दोनों की तुलना करने लगा। वह एक बार सिंह की ओर, और एक बार अपने प्रतिबिम्ब की ओर ध्यान से देखने लगा। उस समय क्षण भर मे ही उसका यह ज्ञान जाग गया कि ‘सचमुच, मै तो सिंह ही हूँ।’ तब वह सिंहगर्जना करने लगा और उसका भेड़ों का सा चीत्कार न जाने कहाँ चला गया! तुम सब सिंह स्वरूप हो, तुम आत्मा हो, शुद्धस्वरूप, अनन्त और पूर्ण। जगत् की महाशक्ति तुम्हारे भीतर है। “हे सखा, क्यो रोदन करते हो? जन्म-मृत्यु तुम्हारा भी नहीं है, मेरा भी नही है। क्यों रोते हो? तुम्हे रोग, दुःख कुछ भी नहीं है, तुम अनन्त आकाश स्वरूप हो जिसके ऊपर नाना प्रकार के मेघ आते है और कुछ देर खेल कर न जाने कहाँ अन्तर्हित हो जाते है; किन्तु आकाश जैसा पहले नीला था वैसा ही नीला रह जाता है।” इसी प्रकार के ज्ञान का अभ्यास करना होगा। हम जगत् मे पाप-ताप क्यों देखते है? कारण, हम स्वय ही असत् है। एक मार्ग मे एक ठूँठ खड़ा था। एक चोर उधर से जा रहा था, उसने समझा यह कोई पहरेवाला है। नायक ने समझा, वह उसकी नायिका है। एक बच्चे ने जब उसे देखा तो भूत समझ कर चीत्कार करने लगा। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने इस प्रकार यद्यपि उसे भिन्न-भिन्न रूपों मे देखा, तथापि वह एक ठूँठ के अतिरिक्त और कुछ भी नही था।