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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५४ ज्ञानयोग

मे हम जीवित है, और जिस समय हम इस क्षुद्र जीवन मे अपने को बद्ध करके रखते है उसी मुहूर्त में मृत्यु है एवं इसी कारण हमें मृत्युभय होता है। मृत्युभय को तभी जीता जा सकता है जब मनुष्य यह समझले कि जब तक जगत् मे एक भी जीवन शेष है तब तक वह भी जीवित है। इस प्रकार के व्यक्तियो को ऐसी उपलब्धि होती है कि, “मै सब वस्तुओ मे, सब देहो मे वर्तमान हूँ। सब जन्तुओं मे मै वर्तमान हूँ। मै ही यह जगत् हूँ, सम्पूर्ण जगत् ही मेरा शरीर है। जितने दिन एक भी परमाणु शेष है उतने दिन मेरी मृत्यु की सम्भावना ही क्या है? कौन कहता है कि मेरी मृत्यु होगी?”-ऐसा ज्ञान हो जाने पर ऐसे लोग निर्भय हो जाते हैं, ऐसे ही समय निर्भीक अवस्था आ जाती है। नियतपरिणामशील छोटी-छोटी वस्तुओ मे अविनाशत्व है यह कहना मूर्खता है। एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक ने कहा है कि आत्मा अनन्त है इसलिये आत्मा ही ‘अहं’ हो सकता है। अनन्त का भाग नहीं किया जा सकता, अनन्त को खण्ड-खण्ड नहीं किया जा सकता। यही एक अविभक्त, समष्टिरूप अनन्त आत्मा है, वही मनुष्य का यथार्थ ‘मै’ है, वही ‘प्रकृत मनुष्य’ है। मनुष्य के नाम से जिसको हम जानते है वह केवल इस ‘मै’ को व्यक्त जगत् मे प्रकाशित करने की चेष्टा का फल मात्र है; और आत्मा मे कभी ‘क्रमविकास’ नहीं रह सकता। यह जो सब परिवर्तन हो रहा है, बुरा-भला हो रहा है, पशु मनुष्य हो रहा है, यह सब कभी आत्मा मे नहीं होता। कल्पना करो कि एक पर्दा मेरे सामने है और उसमे एक छोटा सा छिद्र है; इसके भीतर से मै केवल कुछ चेहरे देख पा रहा हूँ। यह छिद्र जितना बड़ा होता जाता है उतना ही अधिक सामने का दृश्य मेरे सम्मुख प्रकाशित होता जाता है