ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप
(न्यूयार्क में दिया हुआ भाषण)
हम यहाँ खडे है परन्तु हमारी दृष्टि दूर, बहुत दूर—अनेक समय, कोसो दूर चली जाती है। जब से मनुष्य ने चिन्ता करना आरम्भ किया तभी से उसको यह आदत रही है। मनुष्य सदा ही वर्तमान से बाहर देखने की चेष्टा करता है, वह जानना चाहता है कि इस शरीर के नष्ट होने के बाद वह कहाँ चला जाता है। इसी रहस्य को उद्घाटित करने के लिये अनेक मतो का प्रचार हुआ; सैकड़ों मतो की स्थापना हुई, और सैकडो मत खण्डित होकर छोड़ भी दिये गये; और जितने दिन मनुष्य इस जगत् मे रहेगा, जितने दिन वह चिन्ता करता रहेगा उतने दिन ऐसे ही चलेगा। इन सब मतो में ही कुछ न कुछ सत्य है। और इन्ही मे बहुतसा असत्य भी है। इस सम्बन्ध मे भारत मे जो अनुसन्धान हुआ है उसीका सार, उसीका फल मै आपके सामने रखने की चेष्टा करूँगा। भारतीय दार्शनिकों के इन सब मतों का समन्वय करने तथा यदि हो सका तो उसके साथ आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों का भी समन्वय करने की चेष्टा करूँगा।
वेदान्त-दर्शन का एक ही उद्देश्य है—एकत्व का अनुसन्धान या अन्वेषण। हिन्दू लोग विशेष के पीछे नहीं दौड़ते, वे सदा ही सामान्य वस्तु का—नहीं नहीं, सर्वव्यापी सार्वभौमिक वस्तु का