BharatKosha
Back to the archive

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages
Page 325Permalink

अमरत्व ३२१

जीवन, और जीवन का और एक नाम है मृत्यु। अभिव्यक्ति के विशिष्ट रूप को हम जीवन कहते है, और उसीके अन्य रूपविशेष को मृत्यु कहते है। जब तरंग ऊपर की ओर उठती है तो मानो जीवन है और फिर जब वह गिर जाती है तो मृत्यु है। जो वस्तु मृत्यु के अतीत है वह निश्चय ही जन्म के भी अतीत है। मै आपको फिर उसी सिद्धान्त की याद दिलाता हूँ कि मानवात्मा उसी सर्वव्यापी जगन्मयी शक्ति अथवा ईश्वर का प्रकाश मात्र है। तो हम देखते है कि वह जीवन और मृत्यु दोनों के परे है। आप न कभी उत्पन्न हुये थे, न कभी मरेगे। हमारे चारो ओर जो जन्म और मृत्यु दीखती है वह क्या है? यह तो केवल शरीर की है, कारण आत्मा तो सदा सर्वदा वर्तमान है। आप कहेगे, “यह कैसे? हम इतने लोग यहाँ पर बैठे हुए है और आप कहते है, आत्मा सर्वव्यापी है!” मै पूछता हूँ, जो पदार्थ नियम के, कार्य-कारण-सम्बन्ध के बाहर है उसे सीमित करने की शक्ति किसमे है? यह गिलास एक सीमित पदार्थ है; यह सर्वव्यापक नहीं है, क्योकि इसके चारो ओर की जड़राशि इसको इसी रूप मे रहने को बाध्य करती है, इसे सर्वव्यापी होने नहीं देती। यह अपने आस पास के प्रत्येक पदार्थ के द्वारा नियन्त्रित है, अतएव यह सीमित है। किन्तु जो वस्तु, नियम के बाहर है, जिसके ऊपर कोई पदार्थ क्रिया नहीं करता वह कैसे सीमित हो सकती है? वह सर्वव्यापक होगी ही। आप सर्वत्र विद्यमान है। फिर यह कैसे हो रहा है कि मैं जन्म लेता हूँ, मरने वाला हूँ आदि आदि। यही अज्ञान है, मन का भ्रम है। आपका न कभी जन्म हुआ था, न आप कभी मरेंगे। आपका जन्म भी नहीं हुआ, न पुनर्जन्म होगा। आवागमन का क्या अर्थ है? कुछ नहीं। यह सब मूर्खता है। आप सब जगह मौजूद है। आवागमन जिसे कहते है

२१

३२२ ज्ञानयोग

Page 326Permalink

३२२ ज्ञानयोग

वह इस सूक्ष्म शरीर अर्थात् मन के परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई एक मृगमरीचिका मात्र है। यह बराबर चल रहा है। यह आकाश पर तैरते हुये बादल के एक टुकड़े के समान है। जैसे जैसे यह चलता जाता है वैसे ही एक भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि आकाश चल रहा है। कभी कभी जब चन्द्रमा ही के ऊपर से बादल निकलते हैं तो भ्रम होता है कि चन्द्रमा ही चल रही है। जब आप गाड़ी में बैठे रहते हैं तो मालूम होता है कि पृथ्वी चल रही है और नाव पर बैठने वाले को पानी चलता हुआ सा मालूम होता है। वास्तव में न आप जा रहे हैं, न आ रहे हैं, न आप ने जन्म लिया है, न फिर जन्म लेंगे। आप अनन्त हैं, सर्वव्यापी हैं, सभी कार्य-कारण-सम्बन्ध से अतीत, नित्य मुक्त, अज और अविनाशी। जन्म और मृत्यु का प्रश्न ही गलत है, महामूर्खतापूर्ण है। मृत्यु हो ही कैसे सकती है जब जन्म ही नहीं हुआ।

किन्तु तर्कसंगत सिद्धान्त लाभ करने के लिए हमें अभी एक पग और बढ़ाना पड़ेगा। मार्ग के बीच में रुकना नहीं है। आप दार्शनिक हैं, आपके लिये बीच में रुकना शोभा नहीं देता। तो यदि हम नियम के बाहर हैं तो निश्चय ही सर्वज्ञ भी हैं और नित्यानन्द स्वरूप भी। सभी ज्ञान हमारे अन्दर और सभी शक्ति तथा आनन्द भी हमारे अन्दर ही है। हाँ, अवश्य ही है। आप ही जगत् के सर्व-व्यापक सर्वज्ञ आत्मा हैं। परन्तु इस प्रकार की सत्ता या पुरुष क्या एक से अधिक हो सकते हैं ? क्या लाखों करोड़ों पुरुष सर्वव्यापक हो सकते हैं ? कभी नहीं। तब फिर हम सबका क्या होगा ? हम सब एक ही हैं; इस प्रकार का आत्मा एक ही है और वह एक आत्मा ही आप सब

Page 327Permalink

अमरत्व ३२३

हैं। इस तुच्छ प्रकृति के पीछे वही है, जिसे हम आत्मा कहते हैं। एक ही पुरुष है जो एकमात्र सत्ता है, सदानंद स्वरूप, सर्वव्यापक सर्वशक्ति-मान, जन्मरहित, मृत्युहीन। उसी की आज्ञा से आकाश विस्तृत हुआ है, उसी की आज्ञा से वायु बहती है, सूर्य चमकता है, सब जीवित रहते हैं। प्रकृति का वास्तविक रूप वही है; प्रकृति उसी सत्य स्वरूप के ऊपर प्रतिष्ठित है, इसीलिए सत्य प्रतीत होती है। वही आप की आत्मा का आत्मा है, नहीं, और भी अधिक, आप ही वह है, आप और वह एक ही हैं, जहाँ कहीं भी दो हैं वहीं भय है, वहीं खतरा है, वहीं द्वन्द्व है, वहीं संघर्ष है। जब सब एक ही है तो किससे घृणा, किससे संघर्ष; जब सब कुछ वही है, तो आप किससे लडेगे? जीवनसमस्या की वास्तविक मीमांसा यही है। इसीसे वस्तु के स्वरूप की व्याख्या होजाती है, यही सिद्धि या पूर्णत्व है, यही ईश्वर है। जब तक आप अनेक देखते है तभी तक आप अज्ञान मे हैं। "इस बहुत्वपूर्ण जगत् मे जो एक को देखता है, इस परिवर्तनशील जगत् मे जो उस अपरि-वर्तनशील को देखता है और जो उसे, अपने आत्मा के आत्मा के रूपं मे देखता है, अपना स्वरूप जानता है, वही मुक्त है, वही आनन्दमय है, वही लक्ष्य पर पहुँच गया है।" इसलिये समझ लो कि तुम ही वही हो, तुम ही जगत् के ईश्वर हो, 'तत्त्वमसि'। ये धारणायें कि मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, मै रोगी हूँ, मैं स्वस्थ हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं निर्बल हूँ, अथवा यह कि मैं घृणा करता हूँ, मैं प्रेम करता हूँ, अथवा मेरे पास इतनी शक्ति है, यह सब भ्रम मात्र है। इसको छोडो। तुम्हें दुर्बल कौन बना सकता है? तुम्हें कौन भयभीत कर सकता है? जगत् मे तुम्हीं तो एक मात्र सत्ता हो। तुम्हे किसका भय है? खडे हो जाओ, मुक्त हो जाओ। समझ लो कि जो कोई विचार या शब्द तुम्हे दुर्बल

३२४ ज्ञानयोग

Page 328Permalink

३२४ ज्ञानयोग

बनाता है वही एक मात्र अशुभ है। मनुष्य को दुर्बल और भयभीत बनाने वाला संसार मे जो कुछ भी है वही पाप है और उसीसे बचना चाहिये। तुम्हे कौन भयभीत कर सकता है? यदि सैकड़ों सूर्य पृथ्बी पर गिर पड़े, सैकड़ों चन्द्र चूर हो जायँ, एक के बाद एक ब्रह्माण्ड विनष्ट होते चले जायँ तो भी तुम्हारे लिये क्या है? शिला की भाँति अटल रहो; तुम अविनाशी हो। तुम आत्मा हो, तुम्हीं जगत् के ईश्वर हो। कहो “शिवो ऽ हं, शिवोऽहं; मै पूर्ण सच्चिदानन्द हूँ।” और एक सिंह की भाँति पिंजड़ा तोड़ दो, अपनी शृंखलायें तोडकर सदा के लिये मुक्त हो जाओ। तुम्हे किसका भय है, तुम्हें कौन रोक सकता है? – केवल अज्ञान और भ्रम; और कोई तुम्हे पकड़ नही सकता। तुम शुद्धस्वरूप हो, तुम नित्यानन्दमय हो।

यह मूर्खों का उपदेश है कि 'तुम पापी हो, अतएव एक कोने में बैठकर हाय हाय करते रहो।' यह उपदेश देना मूर्खता ही नहीं, दुष्टता भी है। तुम सभी ईश्वर हो। ईश्वर को न देखकर मनुष्य को देखते हो? अतएव यदि तुममे साहस है तो इसी विश्वास पर खड़े होकर उसी के अनुसार अपने जीवन को बनाओ। यदि कोई व्यक्ति तुम्हारा गला काटे तो उसको मना मत करना, क्योंकि तुम तो स्वयं ही अपना गला काट रहे हो। किसी गरीब का यदि कुछ उपकार करो तो उसके लिये तनिक भी अहङ्कार मत करना। कारण, वह तो तुम्हारे लिये उपासना मात्र है, उसमें अहंकार की कोई बात नहीं है। क्या तुम्हीं समस्त जगत् नहीं हो? ऐसी कौन सी वस्तु है और कहाँ है कि जो तुम नही हो? तुम जगत् की आत्मा हो। तुम्हीं सूर्य, चन्द्र, तारा हो। समस्त जगत् तुम्हीं हो। किससे घृणा करोगे और किससे

Page 329Permalink

अमरत्व ३२१

झगडा करोगे ? अतएव यह समझ लो कि तुम्हीं वह हो और इसी के अनुसार समस्त जीवन को बनाओ । जो व्यक्ति इस तत्व को जान-कर समस्त जीवन का उसी के अनुसार गठन करता है वह फिर कभी अन्धकार मे मारा मारा नही फिरेगा ।


Page 330Permalink
<!-- Blank or illustration plate: Page 330 -->
Page 331Permalink

हमारे अन्य प्रकाशन

हिन्दी विभाग

१-३. श्रीरामकृष्णवचनामृत—तीन भागों में—अनु० पं० सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' प्रथम भाग (द्वितीय संस्करण)—मूल्य ६); द्वितीय भाग—मूल्य ६); तृतीय भाग—मूल्य ७॥)
४-५. श्रीरामकृष्णलीलामृत—(विस्तृत जीवनी)—(द्वितीय संस्करण)—दो भागों में, प्रत्येक भाग का मूल्य..... ५)
६. विवेकानन्द-चरित—(विस्तृत जीवनी)—सत्येन्द्रनाथ मजूमदार, मूल्य ६)
७. विवेकानन्दजी के संग में—(वार्तालाप)—शिष्य शरच्चन्द्र, द्वि. सं. मूल्य ५)

स्वामी विवेकानन्द कृत पुस्तकें

८. भारत में विवेकानन्द—(विवेकानन्दजी के भारतीय व्याख्यान) ५) .
९. पत्रावली (प्रथम भाग) (प्रथम संस्करण) २=) .
१० ,, (द्वितीय भाग) (प्रथम संस्करण) २=)
११. धर्मविज्ञान (द्वितीय संस्करण) १॥=)
१२. कर्मयोग (द्वितीय संस्करण) १॥=)
१३. हिन्दू धर्म (द्वितीय संस्करण) १॥)
१४. प्रेमयोग (तृतीय संस्करण) १।=) .
१५ भक्तियोग (तृतीय संस्करण) १।=)
१६. आत्मानुभूति तथा उसके मार्ग (तृतीय संस्करण) १।)
१७. परिव्राजक (चतुर्थ संस्करण) १।) .
१८. प्राच्य और पाश्चात्य (चतुर्थ संस्करण) १।)
१९. महापुरुषों की जीवनगाथायें (प्रथम संस्करण) १।) .
२०. राजयोग ,, १=)
२१. स्वाधीन भारत ! जय हो ! (प्रथम संस्करण) १=)
२२. धर्मरहस्य (प्रथम संस्करण) १)
२३ भारतीय नारी (प्रथम संस्करण) ।।।)
२४ शिक्षा (प्रथम संस्करण) ॥=) .
२५. शिकागो-वक्तृता (पञ्चम संस्करण) ॥=) .

Page 332Permalink

२६. हिन्दू धर्म के पक्ष में ( द्वितीय संस्करण ) ॥=)
२७ मेरे गुरुदेव ( चतुर्थ संस्करण ) ॥=)
२८. कवितावली ( प्रथम सस्करण ) ॥=)
२९. वर्तमान भारत ( तृतीय संस्करण ) ॥)
३०. पवहारी बाबा ( द्वितीय संस्करण ) ॥)
३१. मेरा जीवन तथा ध्येय ( द्वितीय संस्करण ) ॥)
३२. मरणोत्तर जीवन ( द्वितीय संस्करण ) ॥)
३३. मन की शक्तियाँ तथा जीवनगठन की साधनायें ॥)
३४. भगवान रामकृष्ण धर्म तथा संघ—स्वामी विवेकानन्द, स्वामी शारदानन्द, स्वामी ब्रह्मानन्द, स्वामी शिवानन्द, मूल्य ॥=)
३५. मेरी समर-नीति ( प्रथम संस्करण ) ।≡)
३६. ईशदूत ईसा ( प्रथम संस्करण ) ।=)
३७. विवेकानन्दजी की कथायें ( प्रथम संस्करण ) १।)
३८. परमार्थ-प्रसंग—स्वामी विरजानन्द, ( आर्ट पेपर पर छपी हुई )
कपड़े की जिल्द, मूल्य ३॥)
कार्डबोर्ड की जिल्द ,, ३।)
३९. श्रीरामकृष्ण-उपदेश ( प्रथम संस्करण ) ॥=)


मराठी विभाग

१-२ श्रीरामकृष्ण चरित्र—प्रथम भाग, ( तिसरी आवृत्ति ) ३।)
" " द्वितीय भाग ( दुसरी आवृत्ति ) ३।)
३. श्रीरामकृष्ण-वाक्सुधा— ( दुसरी आवृत्ति ) ॥=)
४. शिकागो-व्याख्यानें—स्वामी विवेकानंद ( दुसरी आवृत्ति ) ॥=)
५. माझे गुरुदेव—स्वामी विवेकानंद ( दुसरी आवृत्ति ) ॥=)
६. हिंदु-धर्माचें नव-जागरण—स्वामी विवेकानंद ॥-)
७. पवहारी बाबा—स्वामी विवेकानंद ॥)
८. साधु नागमहाशय-चरित्र—(भगवान श्रीरामकृष्णांचे सुप्रसिद्ध शिष्य)—(दुसरी आवृत्ति) २)

श्रीरामकृष्ण आश्रम, धन्तोली, नागपुर-१, मध्यप्रदेश