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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कालमें हिन्दू पूरे अहिंसक थे। हिन्दुओंको युद्ध विद्यामें ऐसी कुशलता थी कि, इनकी संमता कोई जाति नहीं कर सकती थी, धनुर्विद्याकी योग्यता तो ऐसी थी कि, एक बाणमें सहस्रों बाण छोड़ते थे, विशेष क्या कहें ? इनके समक्ष देव, दानव, राक्षस, यक्ष आदि कोई भी नहीं ठहर सकते थे, महान् प्रभावशाली देवताओंकी भी इनसे सहायता लेनेकी आवश्यकता होती थी। हाय ! शोक ! जबसे भारतवासियोंने मांस खाना और मदिरा आदि मादक पदार्थोंका सेवन करना तथा सज्जनोंके नियमोंको उलंघन करना आरम्भ कर दिया, तभीसे सारी शक्तियाँ ऐसी भाग गईं कि, अब उनका पता भी नहीं सुना जाता। प्राचीन मन्त्रोंमें भी असर न रहा। क्योंकि, अब हिन्दू-हिन्दू नहीं रहे, म्लेच्छोंके कर्म करके म्लेच्छोंके समान बन गये। हिन्दू उसे कहते हैं जो हिंसासे दूर रहे। हिन्दू शब्द दो शब्दोंके संयोगसे बना है-हिन् और -दू। ये दो शब्द हैं-हिन्-का अर्थ है। हिंसा, दू-का अर्थ है-अलग रहना, हिंसासे -सा को अलग किया, उसके साथ-दू-को मिला देने से - हिन्दू शब्द होता है। जो हिंसासे बिलकुल अलग रहे उसे हिन्दू कहते हैं। आर्यशब्दके भी ऐसेही श्रेष्ठ और उत्तम अर्थ हैं। मांस खानेसे हृदय और मस्तिष्क निर्बल और अशुद्ध हो जाते हैं येही विवेक और विचारके स्थान हैं। गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल् हिण्ट्री देखो वह भी मांसाहारियोंके विषयमें ऐसेही समर्थन करते हैं।

ब्राह्मणोंका निर्बल्य तथा परशुराम - ब्राह्मण हिंसाहीके कारण ऐसे निर्बल और कि, उनमें शूरताका नाम भी नहीं रहा। उनके अतिपराभवको देखकर भगवान्ने परशुरामजीको भेजा, इन्होंने शूरवीरता और तप दोनोंका उदाहरण एकत्र उपस्थित कर दिया तथा लोगोंको त्यागको माहात्म्य भी दिखा दिया। ये बड़े प्रभावशाली और शूरबीर हुये, उनने बड़ी तपस्याकी जिसके बलसे बड़े ऐश्वर्यको प्राप्त हुये। ब्राह्मणोंने ऐसा प्रभावशाली देखकर धर्मावतार परशुरामसे कहा उनकी बड़ी स्तुति की, उनके सम्मुख रोये, गिड़गिड़ाये अपना दुःख प्रगट किया। महाबली परशुरामने क्षत्रियोंको मारकर राज्य छीन लिया ब्राह्मणोंको राजा बनाकर कहा कि, तुम सुखपूर्वक राज्य करो। स्वयं तपस्या करनेको चले गये। उनके चले जानेके बाद क्षत्रियोंने फिर मार कूटके राज्य छीन लिया। ब्राह्मणोंने फिर पशुरामकी शरण ली, परशुरामजीने क्षत्रियोंको मारकर ब्राह्मणों को राज्य दे दिया। इसी प्रकार क्षत्रियों और परशुराममें अनेक बार लड़ाई हुई, अन्तमें ब्राह्मणोंको राज्य स्थापितकर परशुरामजी तपस्या करने चलने लगे, ब्राह्मणोंने कहा कि, महाराज ! हम अनेक बार दुःख उठा चुके हैं आप हमें छोड़े