भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1003

जाते हो, आपके परोक्षमें क्षत्री लोग हमको आकर मारें तो क्या किया जावेगा ? परशुरामजीने एक घण्टा बाँध दिया कि, जब क्षत्री चढ़ाई करें उस समय इस घण्टाको बजा देना, मैं शीघ्रही आ जाऊँगा, यह कहकर तपस्या करने चले गये । कुछ कालके पीछे ब्राह्मणोंने अपने मनमें विचार किया कि, क्षत्री लोग हमारे ऊपर चढ़ आवें, घण्टा बजानेसे परशुरामजी न आवें तो हम लोगोंकी बड़ी दुर्गति होगी, यह शोच परीक्षाके हेतु घण्टा बजाया, शब्द होतेही परशुरामजी आ उपस्थित हुये । पूछा कि, तुमने घण्टाको क्यों बजाया ? किस शत्रुने तुम्हारे ऊपर चढ़ाई की ? ब्राह्मणोंने कहा कि, हम लोगोंने क्षत्रियोंसे भयभीत होकर परीक्षाके लिये घण्टा बजाया है । इस बात पर परशुरामजीने क्रुद्ध होकर कहा कि, ओ डरपोको ! तुम लोगोंसे राज्य न होगा, तुम लोग राज्य करनेके योग्य नहीं हो, क्षत्री लोगही राज्य करेंगे तुम लोग उनके पुरोहित बनकर अपने दिन बिताओगे । सत्य संकल्प परशुरामका संकल्प कौन टार सकता था, क्षत्रियोंने आकर फिर राज्य ले लिया, ब्राह्मण लोग यजमानी वृत्तीसे अपना कालक्षेप करने लगे । शनैः शनैः लोभ और तृष्णा वश हो निषिद्ध दान लेनेसे दरिद्रताको प्राप्त हो गये । ब्राह्मणोंको ऐसी हीनावस्थामें प्राप्त होनेका कारण केवल हिंसाही है । हिंसाके कारण इनके भाग्यमें भीख माँगना आना ही था । परशुरामजीके बल करनेसे क्या हो सकता था ? क्षत्रियोंका भाग्य चमका हुआ था, जिसका कारण केवल एक अहिंसा ही था ।

अधिकता—जीवधारियोंके पूर्वके कर्मानुसार शक्ति और बल प्राप्त होते हैं । हाथी व्याघ्रसे भागता है, वह शेरके बलसे भयभीत होकर नहीं भागता वरन् प्रकृतिने स्वभावसेही व्याघ्रको ऐसे हथियार दिये हैं कि, जिसके भयसे हाथी जैसा बलावान् भी उसके सम्मुख हार मानता है । व्याघ्र, बाज, शाहीन आदि हिंसक पशुओंमें जो शूरता देखी जाती है उसका कारण यही प्राकृतिक नियम है । जीवधारियोंको उसके कर्मानुसार शारीरिक बल तारतम्यतासे प्राप्त है । हिंसक मांस आहारी पशुओंकी अपेक्षा शाक, पात, नाज, फल खानेवालोंमें अधिक शूरता है । देखो बटेर और बुलबुल, मुर्गा मेंढा, शूकर और भैंसा आदिककी लड़ाई कौसी भयानक होती है । बनका शूकर व्याघ्रसे भी अधिक बलवान् होता है । मांस खाने से शारीरिक बल और काममें विशेषता नहीं होती, व्याघ्र और बिल्ली आदि मांस आहारी पशु विशेष कामानुर नहीं होते, वरन् मुर्गी और कबूतर आदिकोंमें विशेष काम होता है ।

अहिंसक सुखी हैं—मुसलमानोंकी अपेक्षा हिन्दू बहुत सुखी हैं यदि एकही