कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 1007 of 1367
Read in contextइन विद्वानोंने अपनी जाँचको एक पूरी सीमातक पहुँचाई है । भारतीय ज्ञानी साधु जनोंका बचन है कि, जो लोग बहुत पाप करते हैं वे मरकर सुषुप्ति अवस्थामें जाते हैं वृक्ष आदि बनते हैं । कबीर साहबका बचन है कि, कर्मका बदला नहीं छूटता, उसी तरह जीवधारियोंके भक्षण करनेमें इन तत्वज्ञोंका बचन मिलता है । उन्होंने अपने तजुर्बासे लिखा हो अथवा ज्ञानी विद्वानोंके बचन लेकर लिखा हो दोनों बराबर हैं। तनिक भी भेद नहीं है । मांसमें भी सैकड़ोंमें छत्तीस भाग वह तत्व है जिससे मनुष्यकी शारीरिक उत्पत्ति होती है, शेष चौसठ भाग पानी है, जिससे कुछ भी लाभ नहीं है इसका उलटा अंकुरज और विशेष करके नाजमें अस्सीसे नब्बे भाग तक वह तत्व होता है जिससे मनुष्यके शरीरकी उत्पत्ती और पोषण होता है । इसके सिवा मनुष्यकी प्राण वायु (हरारत गरीजी) के लिये जिस तत्वकी आवश्यकता है जिसको कि, कारबोनी कहते हैं, वह भारे हुये पशुके मांसमें सब्जीकी अपेक्षा बहुत कम होता है । हड्डियोंके दूह और स्थिर करनेवाले तत्व भी सब्जीमें विशेष पाये जाते हैं । मांसकी अपेक्षा साग पातका भोजन बहुतही श्रेष्ठ है । जब कि, हम उसके यथार्थ लाभको विचारें बाहरी मांसकी फुलावटकी ओर ध्यान न दें ।
प्रकृति वैपरीत्य - जो मांस आहारी पशु हैं प्रकृतीने उनको स्वाभाविक एक ऐसी शक्ति दी है जिससे वे रातको साधारणतः आखेट कर सकते हैं, पर उसके उलटा मनुष्यमें एक ऐसी शक्ति है जो इसे रातको सोजानेके लिये भजबूर करती है ।
जो पशु मनुष्यके पास बहुत दिनोंतक रहते हैं वे अपनी फुर्ती चालाकी और शारीरिक बलसे बहुत प्रकारसे अपनी सेवा पूर्ण करते हैं, उनका सब्जीही खाकर पोषण होता है । गाय, बैल, खच्चर, घोड़ा, ऊँट आदि सब्जीकाही भोजन करते हैं ।
वेजिटेरियन - अङ्ग्रेजी भाषामें उनको बोलते हैं, जो कि, साग, पात, फल, फूल आदि खाकर जीते हैं, कदापि मांस नहीं खाते, उन लोगोंका साधारण जीव इस बातकी साक्षी देता है कि, मांस आहारियोंकी अपेक्षा उनके शारीरिक रोग बहुत कम होते हैं उनमें प्रायः मनुष्य ऐसे भी पाये जाते हैं, जिनको वृद्धा अवस्था तक भी बड़ी कठिनाइयोंसे ढूँढ़ने पर एक आध बीमारी जान पड़ती है । इङ्ग्लैण्ड और अमेरिकाके वेजिटेरियनोंमेंसे एक भी ऐसा दृष्टान्त नहीं हुआ कि, जिससे यह मालूम हो कि, उनमें कोई एक सप्ताह तक भी रुग्ण रहा हो ।
रालिन्स साहिब-इस्पार्टन लोग संसारकी सर्व जातियोंके इतिहासमें अपनी शारीरिक बल, शूरबीरता, शरीरके डील डौल आदिकके कारण अनु-