भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1006, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1006

मांस आहारी मद्यप और नशेबाजोंसे न कभी साधु गुरुकी सेवा हुई न, भजनही बना वरन् वह साधुओंसे बाद विवाद किया करता है, उनकी मसखरी उड़ाता है, उनमें दोष निकालता है। जो सच्चे साधुओंमें स्नेह रखनेवाल होगा, वही ईश्वरका प्यारा होगा। जो सच्चे साधुओंमें प्रेम नहीं रखता वह ईश्वरका शत्रु है। सच्चे सन्तकी शरण गहे बिना कदापि परमात्मा न मिलेगा। मांस आहारियोंमें दोनोंही अवगुण होते हैं, इस कारण उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो जाता है, वे प्रकाशका मार्ग नहीं पाते उनसे दीनता दूर हो जाती है तथा मान बड़ाई अहंकारमें फँस जाते हैं।

यूरोपके विद्वानोंकी सम्मतियाँ

योरप देशके तत्त्ववेत्ताओं (PHILOSOPHERS) का विचार है कि, मनुष्य मांस खानेके लिये नहीं बनाया गया, इसका यथार्थ मांस भोजन नहीं है। मनुष्यको किसी प्रकारसे भी मांस न खाना चाहिये। मनुष्यके शरीरकी भीतरी और बाहरी बनावट बताती है कि, मांसाहारी जीवधारियोंमें नहीं है, वरन् अनाज साग, पात, फल आदिक खाकर अपना जीवन व्यतीत करनेके लिये बनाये गये हैं। बड़े २ नेचरलिष्ट विद्वान् और प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता लोगोंकी ऐसीही संमतियाँ हैं लीलीस्टन्, गिनी, सर एवर्ड होम्, वरन् कोबेरी, प्रोफेसर लारेनेस, लार्ड मेनबोडो मिस्टर टाम्स वेल जैसे बड़े २ समीक्षकोंने पूरी जाँच करके प्रगट किया है कि, मनुष्यके दांत पेट और अंतडियों तथा उसके शरीरकी बाहर भीतरी बनावटें प्रगट करती हैं कि, वह मांस आहारी उत्पन्न नहीं किया गया, प्रकृतिने इसके स्वभाव और बनावटसे इसे मांस त्यागी बनाया है।

मिस्टर लार्ड बक और मिस्टर गोसिङ्गल्ट — आदि रसायन विद्याके, प्रसिद्ध विद्वानोंमें थे, उनके वचनोंसे इस बातको प्रमाणित करता हूँ वे लिखते हैं कि, जो मनुष्य पशुओंका मांस खाता है, वही फिरसे घास पात बनता है, जो कि, रूप बदलकर मनुष्योंके खानेमें आता है जिसके द्वारा खानेवाले जीवधारीका पालन होता है। सब जीवोंमें जो एक किसमकी अण्डेके समान सफेदी होती है, वह जीवधारियोंकी समानही होती है इस सफेदीको अंग्रेजीमें एलू बियोमन कहते हैं। इसी प्रकारसे उनकी रगें और मनुष्योंकी रगें एकसी होती हैं, यहाँतक कि, उनके स्वरूपमें भी किसी प्रकारका भेद नहीं होता। कह बात लार्डबक् साहबकी फीमेली आर लेटर्ज आन कोमिस्ट्री किताबमें लिखी हुई है।

समीक्षा — विचार करना चाहिये कि, यह वचन मिस्टर लार्डबक् और बोसंगाल्ड आदिकोंका वचन भारतवर्षके ज्ञानी ऋषीश्वरोंके साथ मिलता है,