भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करते फिरना पड़ता है । शास्त्रानुसार नियमित तीर्थोंमें फ़िरनेके पीछे, ब्रह्म भोज, भण्डारा और जाति भोजके अतिरिक्त बहुत कुछ दान पुण्य करने पर उसको जातिमें मिलाते हैं । उसको ऐसा कठिन दण्ड होता है कि, बहुत दुःखी होता है । यह रीति न्यूनाधिक्य करके समस्त भारतवर्षमें है, इस बातका पूरबमें अधिक प्रचार है ।

हिंसकोंके मारनेका कारण — मनुष्य सृष्टिमें सबसे श्रेष्ठ है मनुष्यसे श्रेष्ठ परमात्मा है जो कोई अपने शासककी आज्ञा न माने उसके कार्य्यको पूरा न करे तो अवश्य दण्डका भागी होगा, जितने हिंसक पशु हैं वे मनुष्यके कोई काम नहीं आते, वरन् अवसर मिलनेपर घात करते हैं, इस कारण मनुष्य उनको मारते हैं । जिस प्रकार मनुष्यके हिंसक पशु शत्रु हैं, उसी प्रकार मांस आहारी और नशेबाज मनुष्य ईश्वरके शत्रु हैं । ईश्वर उनको अवश्य नरकमें डालेगा ।

सबसे हिंसक और अहिंसक — जितने हिंसक पशु हैं सबको प्रकृतिनेही उनके योग्य नख, दांत दिये हैं, पर मनुष्यकी उत्पत्ति हिंसक नहीं है । इसी कारण प्रकृतिने उनको हिंसाकी सामग्रीसे वञ्चित रक्खा है, पर प्राकृतिक नियमको तोड़कर ये हथियारोंसे जीर्वाहिंसाका काम करते हैं । इसी कारण ऐसी हिंसा और मांस अहार प्राकृतिक नियमके विरुद्ध है इसके करनेसे अवश्य दण्ड पावेंगे ।

पापी और कृतकृत्य — शरीरके पोषण और जिह्वाके स्वादके लिये लोग मांस खाते हैं । यह शरीर जिसको वे सत्य जानकर पालते हैं पाप करके महान अधर्मके कर्ता बनते हैं, सो एकदम असत्य है । जो लोग असत्यसे प्रीति करेंगे वे कभी सत्यको प्राप्त न कर सकेंगे । जो लोग तन, मन, धन, ईश्वरार्पण करते हैं वेही कृतकृत्य होते हैं ।

इखलाकी असूल — भी मनुष्यको मांस आहारी होना नहीं चाहता. क्योंकि, जावनरोंके मारनेके समय उनकी जो दशा होती है, उनके हाथ पांवका फड़-फड़ाना, दुःखके साथ बलबलाना, हृदय वेधक शब्दके साथ चिल्लाना, प्राण निकलनेके समय महान् कष्टका होना, कठिनसे कठिन हृदय को भी द्रवीभूत कर देता है इससे प्रतीत होता है कि, मनुष्य मांसाहारके लिये नहीं बनाया गया ।

मुक्तिके अधिकारी — मुक्तिके दो किनारे हैं, दोनोंही उसके आधार हैं, पहला कर्म, उपासना, ज्ञान और विज्ञान, सच्चे साधु गुरुकी सेवा दूसरा सच्चे परमात्माका भजन है इन दोनोंमें ये चार २ डण्डे हैं, दोनों आधारोंसे ये चारों येस्थित रहते हैं । आधार न हो तो डण्डे किस तरह स्थिर रह सकते हैं । जो साधु और गुरुकी सेवा हिन्दू जातिमें है वह किसी जातिमें नहीं है ।