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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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मनुष्यता प्राप्त हो, भ्रम छूट जाये। स्वसंवेदके पढ़नेवालोंकी सङ्गति हो, तब सत्य असत्यका ज्ञान होकर उसका ज्ञान हो।

विद्वानोंके भेद — दो प्रकारके विद्वान् हैं। एक लौकिक, दूसरे पारलौकिक। दोनों पुस्तकें पढ़ पढ़करही पूर्णताको पहुँचते हैं। हजारों पुस्तकें छान डालते हैं पर यथार्थको नहीं जान पाते। यदि वे लोग यथार्थको समझते तो संसारमें कभी द्वेष नहीं फैलता।

धार्मिक विद्वानोंमें दो प्रकारके लोग हैं। पहले वे हैं जो अपने गुरु और आचार्यकी आज्ञापर चलते हैं, गुरु शास्त्र पर पूर्ण श्रद्धा रखते हैं। सच्चे अन्तः-करणसे गुरुकी सेवामें लगे रहकर सुकर्म करते हैं दूसरोंको भी कुमार्गसे बचाकर सुमार्गमें प्रवृत्त करते हैं।

दूसरे पण्डित या (उल्मा) — दुष्ट स्वभावके हैं जो स्वयं सत्यपथसे भूलें हैं दूसरोंको भी भटकाते हैं। अपने गुरु और आचार्यके विरुद्ध मार्ग बतलाकर मनुष्योंको बहका २ नरकका मार्ग दिखलाते हैं। अपनी दुष्टतासे कभी नहीं चकते। अच्छे और सरल हृदयके मनुष्योंको भी भटकाकर अश्रद्धालू अधर्मी बना देते हैं। ऐसे शौतानोंसे ईश्वर रक्षा करे।

अर्थ करनेवाले — वेदधर्मके सहस्रों पण्डित इतने अधिक हुये हैं कि, वेदके अर्थको मनमाना करके यथार्थ आशयसे मनुष्यको विमुख रखकर कुमार्गमें डालते हैं। वैदिक कोषमें एक एक शब्दके बहुत अर्थ कहे हैं। इस कारण जिसके मनमें जैसा आता है वैसाही अर्थ करके अपने अनुयायियोंको समझाता है उसीपर दृढ़ करा देता है। इसी प्रकार कुरानके टीकाकारोंने भी किया और करते जाते हैं। अगर इन लोगोंसे पूछा जावे कि, आप जो इस प्रकारसे समझते समझाते हो, इसका क्या कारण है? आपको ऐसे अर्थ करनेके लिये आकाशवाणी हुई है अथवा ईश्वरने स्वयं आकर ऐसा अर्थ करनेके लिये कहा है, आपके अर्थकी कैसे शुद्धि मालूम हो? उसके उत्तरमें सब अपने २ पक्षको सिद्ध करनेके लिये हजारों प्रकारकी बातें बनाते हैं। युक्ति और प्रमाण लाते हैं, पर कोई भी सन्तोषकारक नहीं होता। सब कोई अपने ईश्वरको व्यापक बतलाते हैं, जिसके गुरु और आचार्य को कभी ईश्वरका ज्ञान न हुआ उनके वचनोंसे अज्ञानता टपकती है वे बहुत लम्बी चौड़ी बातें बनाते हैं, अपने वाग्जालमें डालकर सरल हृदयोंको फँसाते हैं। भला ईश्वर व्यापक है तो तत्व और तीनों गुण यह भी तो व्यापक हैं? हां जिसके गुरु और आचार्यमें ज्ञानकी शुद्धता होगी सत्यताको बरतेंगा तो वह अपने अनुयायियोंको कुछ मार्ग बतला सकेगा। यदि आचार्य गुरु और उपदेशक स्वयंही अज्ञानी होंगे तो वे दूसरोंके क्या उपदेश करेंगे?

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