कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकर्तव्य - मनुष्यको उचित है कि, मनुष्यत्व (मनुष्यधर्म) को ओर ध्यान दे । उसको भली प्रकार विचारकर आचरण करे जो जान बूझ कर भी मनुष्य धर्ममें प्रवृत्त नहीं होता उसपर शोक और धिक्कार सब धर्मोंके आचार्योंको देखले कि, पहले पुण्यका मार्ग बतलाकर पीछे पाप और निषिद्ध मार्गमें लगा देते हैं ।
बन्ध मोक्षकी विद्या - स्वसम्बेदके पढ़े विचारे बिना किसीको न कभी सुख हुआ है न होगा । जो अपरा विद्यासे अपना कल्याण चाहता है वह महामूर्ख है । परसम्बेद (अपराविद्या) में कदापि मुक्तिकी प्राप्ति नहीं, यह केवल संसार की मर्यादाको स्थिर करनेके लिये है । जिसका मन जिधर चाहे - परसम्बेद (अपराविद्या) पढ़कर बन्धनमें रहे अथवा स्वसम्बेद (पराविद्या- पढ़कर मुक्त हो जाये । बन्धनके लिये अपरा विद्या और मोक्षके लिये परा विद्या है ।
ज्ञानी और अज्ञानी ।
इस संसारमें दो प्रकारके लोग हैं, दोनों एक समान जीवधारी हैं । एकको पण्डित ज्ञानी तथा दूसरेको मूर्ख अनपढ़ कहते हैं । एक मनुष्य, दूसरा पशु बोला जाता है । यद्यपि भिन्न २ रूप बने हैं, पर दोनोंका एकही ढङ्ग हैं। पशु और मनुष्य दोनोंमें पढ़े पण्डित और अनपढ़ मूर्ख दोनों एक समान हैं । इन दोनोंमें मनुष्य श्रेष्ठ है । यही देह भक्ति और मुक्तिके लिये बना है । यही ज्ञान और मुक्तिका द्वार है । इन दोनोंमें ज्ञानी और अज्ञानी एकसे हैं, दोनोंमें भले बुरे एकही रीतिके हैं । जो मनुष्यकी रीति धारण करे, जिसमें मनुष्यत्व पायाजाय वही योग्य है । जिसमें मनुष्यत्व न हो वह त्याज्य है ।
पण्डित और मूर्ख ।
प्रथम मैं संस्कृत भाषाके पढ़े हुये लोगोंका वर्णन करता हूँ । इसमें प्राचीन कालमें बड़े २ विद्वान् ज्ञानी होगये हैं । वे लोग अपनी विद्या बलसे तीनों कालका समाचार कह सकते थे । किसी भी देशका पुरुष उनकी समानता नहीं कर सकता था । जबसे हिन्दुस्थानसे हिन्दुओंका राज्य जाता रहा वे संस्कृतके विद्वान् भी लुप्त हो गये, लोगोंकी स्मरण शक्तिमेंभी निर्बलता आगई । वर्तमान कालके कतिपय पण्डितों विद्वानोंमें कुछ थोड़ा २ ज्ञानका प्रकाश रहता है पर वे बात कहाँ पायें ? जो कोई संस्कृत पढ़ता है, वह पहले संस्कृतकी वर्णमाला सीखता है पीछे व्याकरण वेद, शास्त्र, मन्त्र आदि सीखता है, पर प्रायः दखा जाता है कि, कोई वर्णमालाके अक्षरोंका अर्थ न सीखता है, न सिखलाता है । केवल शब्दोंके ही अर्थ