कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसिखते सीखलाते हैं । अक्षरोंके अर्थको कोई नहीं जानता, प्रायः कोषादिकोंमें अक्षरोंके अर्थ समझे बिना व्याकरण आदि पढ़ जाते हैं, उनमें वह शुद्धता नहीं होती, जिससे कि, बुद्धि शुद्ध होकर परमात्माको जान जाय ।
मुक्तिका हेतु — सन्त गुरुकी दया होनेपर कर्म उपासना और योग आदिसँ अन्तःकरणको शुद्ध बनाते हैं विधि और निषेध ये दो बाते हैं । वेदों और किताबोंमें इन्हींका वर्णन है । भक्तिके बिना सब पठन पाठन व्यर्थ है, सारी आयु पढ़नेमें बितादें, तो भी भजनके बिना व्यर्थही है । धार्मिक विद्वानोंमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि ऋषियोंने वेदको पढ़ा, पर ऊँकारके भेदको न जाना, इस कारण उनकी मुक्ति नहीं हुई । सबोंने ज्ञानकी सात भूमिका और चार अवस्था ठहराई, परिश्रम करके उससे पार भी हुये तो भी सुख प्राप्त न हुआ । जिस दशामें कि, स्वयंवेद ईश्वरको वर्णन करनेमें अशक्त है. वह कहता है कि—हे प्रभु ! तू अलख करतार है, मेरी पहचानमें नहीं आता । फिर बिना गुरुके वेदोंपर भरोसा करके बैठे रहना व्यर्थ है । सातों भूमिका, चारों अवस्था केवल ब्रह्मरूप हैं, संसारमें सबसे श्रेष्ठपद मनुष्यका है. क्योंकि वह जाग्रत अवस्थाका अधिकारी है । यदि जाग्रत अवस्थाके कार्यको पूरी विधिसे करे तो अवश्य ही मुक्ति पा जायगा ।
किसीका भी भ्रम न गया — दूसरे पशु, जो स्वप्नावस्थामें हैं उनकी कुछ गणना नहीं । तीसरे स्थावर औषधी आदि हैं, जो कि सुषुप्ति अवस्थामें हैं । चौथे होरा, लाल आदि खनिज पदार्थ हैं जो कि घन जड़ सुषुप्तिमें हैं उनकी बातही क्या है ? वे तो अत्यन्त अचेत अवस्थामें हैं । उपरोक्त तीन अवस्थाओंमें सब जीव बन्द हैं । चौथी तुरियावस्था है, उसमें ज्ञानी बन्द हैं । इसके चार प्रकार हैं—१ बर, २ ब्रह्मदत्त, ३ बलिष्ठ, ४ वरियान । चारों प्रकारके ज्ञानी इन चारों श्रेणीमें बन्द हुये अपने ज्ञानसे परमानन्दको प्राप्त कर रहे हैं । तीनों श्रेणियोंके ऊपर तुरियातीतका पद है । इस अवस्थामें ईश्वरके पदको प्राप्त होता है, पर बन्ध नहीं छूटता । अपने कर्मोंसे उसको भी छूटकारा नहीं, यह सब मायासे है । जो जो नाम और ध्यान उनको मिला वे सब मायाकेही ध्यान नाम हैं । उनको जो प्रकाश होता है सब मायाकी ओरसे होता है । इसी कारण उनको यथार्थ स्वरूपका ज्ञान नहीं होता । उनमें जो ज्ञान हैं वो सब नाशमान हैं । जो कर्म, ज्ञान और उपासनासे प्राप्त होता है वो कुछ नहीं है । वे लोग यथार्थसे बहुत बंचित रहे, उनमेंसे किसीका भी भ्रम न छूटा ।
उन सांसारिक विद्वानोंका दूसरी श्रेणीमें वर्णन करता हूँ, जो केवल वेद किताब पढ़ते हैं पर ज्ञानका प्रकाश नहीं रखते, अपनेको ईश्वर ज्ञानी समझते हैं ।