कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextज्ञानके साधन ।
सम, सन्तोष, विचार और सत्संग ये चारों मुक्तिके पौरिये हैं । जो इनको धारण करेंगे उनको सब कुछ प्राप्त होगा । इनसे अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तः-करणके शुद्ध होनेसे सब कुछ शुद्ध हो जाता है, इन बिना किसीको भी मुक्ति मार्ग नहीं मिल सकता । इन्हींसे मनुष्य विचार करता है, मेरे गुरुकी कहाँतक पहुँच है ? उसमें मुझे मुक्त करनेकी सामर्थ्य है वा नहीं ? वह किस देवताकी भक्ति बतलाता है ? उसकी सामर्थ्य कहाँतक है ? जो लोग अपनेको ब्रह्म कहते हैं उनमें ब्रह्म का कुछ लक्षण है या नहीं ? यदि कोई किसी पदार्थ को कपूर बतलावे उसमें कपूरकोसी सुगन्धि न हो, उसके समान गुण भी न हों तो उसे किसी प्रकार भी कपूर नहीं कह सकते । यह जीव अपने बन्धनके लिये आपही जाल रचता है उसमें आपही फँसकर मर जाता है । जो मनुष्य मनुष्यत्वको न धारण करे उसमें मनुष्यके गुण न हों, वह कैसे मनुष्य ठहरेगा ? मनुष्य अपने मनुष्यत्वके गुणोंको जान लेता है तब धारण करता है । पक्षपात और धर्मद्वेषके निकट नहीं जाता, सत्य स्वीकार करता है असत्यसे दूर भागता है । लोग प्रायः मिथ्या बकबक झकझकमें लगे रहते हैं । वे अपने मनमें तनिक भी विचार नहीं करते । न समझते हैं कि, अविद्यासे तीनोंको उत्पत्ति है, इन्हींसे सारा व्यवहार चल रहा है फिर ज्ञान और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाला कौन हो सकता है ? यदि तीनों देवताएं अज्ञानके घेरेसे बाहर होते तो उनसे मनुष्योंको मुक्ति प्राप्त होजाती । सब पक्षपातमें फँसे हुये हैं कौन सत्यका खोज करता है ? कौन गुरु है ? किसके उपदेशसे अज्ञान दूर होकर ज्ञान प्राप्त होता है ? इसका विचार निरपक्षही कर सकता है । विद्या और अविद्या दोनोंका प्रगट करनेवाला ब्रह्म है, सो दोनों ही मिथ्या हैं । विद्या अविद्याको नष्ट कर देती है, अविद्या विद्याको मिटा देती है जैसे कि, बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है, वो सारे बनको जलाकर अन्तमें आप भी शान्त हो जाती है ।
वह आग कौन है, कहाँ है ? जो सबको जलाकर भी शान्त न हो सर्वदा एक समान प्रकाशित रहे । यदि सब कुछ मैंही होता तो बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कौन था, सीखनेवाला कौन है ? सीखता कौन है ? अज्ञान किसको लगा ? एक ब्रह्म अज्ञानी और दूसरा ज्ञानी क्यों हुआ ? एक ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, यह क्योंकर कहना ठहरा ? अद्वैत न रहा तो अनन्त ब्रह्म हो सकते हैं । वेदान्ती कहते हैं कि, सब जगत्में है एकही ब्रह्म । जैनी कहते हैं कि, अनन्त ब्रह्म हैं अर्थात् जितने जीव हैं उतनेही ब्रह्म हैं । वेदान्तियोंके एक और जैनियोंके अनेकों का न्याय किस प्रकार हो ? क्या एक ब्रह्मका बाप आकर वेदान्तियोंसे कह गया है कि, एक