कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 116 of 1367
Read in contextतथा अद्याने किया था। जैसे निरंजन और अद्याने सत्यपुरुषके नाम गुप्त कर अपनी बड़ाई सारे संसारमें प्रगट की, उसीप्रकार तीनों भाइयोंने अद्या और निरंजनका नाम बिलकुलही छिपाकर, संसारमें अपनी पूजा तथा प्रतिष्ठाका प्रचार किया।
जब तीनों भाइयोंने यह कार्य किया और अद्याने भी जानलिया कि, मेरे बेटे तो मेरा नाम बिलकुलही मिटाकर केवल अपनी बड़ाई सृष्टिपर प्रगट करके अपनी पूजा कराते हैं और मुझको कोई नहीं पूछता।
छियालीसवाँ प्रकरण
अद्याकी पूजाका प्रचार।
जब अद्याने पुत्रोंकी कृतध्मता और स्वार्थको जान लिया तब, उसने अपने शरीरसे अपने रूपकी तीन कन्याएँ प्रकट कीं। वे अत्यंत कोमलाङ्गी तथा सुन्दरी हुई। उन तीनोंका नाम क्रमशः १ रम्भा, २ सूची, ३ रेणुका रक्खा और उन्हें आज्ञा दिया कि, ऐ बेटियो! तुम जाओ और समस्त संसारको आकर्षित करके मेरी पूजा संसारमें प्रचलित कराओ। वे तीनों अपनी माताकी आज्ञा पातेही, पहले आकाशको उडगयों और समस्त देव गंधर्व तथा चारण इत्यादिकों का चित चुरा लिया, फिर सब गंधर्वोंको अपने साथ मिला लिया जब सब देव और गंधर्व इत्यादि इनके बशमें आकर इनके दास बन गये, तब छत्तीस प्रकारके बाजे और सब गंधर्वोंको अपने साथ लेकर पृथ्वीवर आर्यों, ब्रह्मा विष्णु शिव तथा समस्त ऋषि मुनिके मनको मोह लिया। जब उन लोगोंने छत्तीस प्रकारके बाजे और तिरसठ प्रकारकी राग रागिनी छेडी तब उनको सुनकर, सबका चित्त चञ्चल तथा अधीर हो गया। सब लोग उनके दास बन गये फिर तो उन्होंने अद्याकी पूजाका समस्त संसारमें प्रचार किया। अब भवानोका पूजन सब करने लगे। विशेष वृत्तान्त अम्बुसागरके पाँचवें तरंगके अनुमानयुगकी कथा परिशिष्टमें देखना चाहिये।
सैंतालीसवाँ प्रकरण
पाँचोंकी पूजाका निश्चित होना और निरञ्जनका सर्वाधिपत्य।
इन्हीं पाचों—निरञ्जन, अद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिवकी पूजा प्रचलित हुई। इन पाँचके आगे कोई कुछ नहीं जानता इन्हींका समाचार चारों वेद और