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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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तुही ऐ आग खालिक है जहाँकी । तुही महरम है इसरारे निहाँकी ॥
तुही ऐ आग सब जाँदार मामूर । तुही मालिक जमीन और आस्माँकी ॥
तुही देती है सबको खौफ अल्लाह । तु देवे फेर अकल राजदोंकी ॥
जहां आजिज न पण्डित स्वसंवेदी । तु बैठी अकल पर हर वेद ख्वाँकी ॥
जहां सत गुरु न कोई हंस उसके । वहां ऐ आग तू रह बैठ घुसके ॥५॥

यथा ।

नहीं दर्वेश सा कोई जहांमें । कि जिनको फिक्क हक्क दिल और देहों हैं ॥
जितने दुनिया सलातीन और गनी हैं । न कोई हक्क शनास इन जेरकोंमें ॥
न जिनको अपने अपने हक्कसे खबर है । सो हैवान सूरत आदम वहाँ में ॥
जिन्हें हक्कसे खबर सूर्य शहदो आलम । उनहीसे हक्क इनसानी अदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ १ ॥

जिन्हें शबो रोज अशरतमें गुजरते । न जो गुरु साधुओंका संग करते ॥
पचे निसिदिन ब आफातेन जमाना । तमअ हिसों हवस शहवतसे मरते ॥
हसद कीनः व बुगजो पुर अदावत । कभी जिकरो फिक्क हक्क दिल न धरते ॥
कुछ नहीं होश जिसको आखरतकी । सरापा सद् गुनाहोंसे लदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ २ ॥

हैं फुकरा बावशाहों आलिमोंके । सोई रहबर है मुफनसि जालिमोंके ॥
वहीं हैं जाबना बरते खुदाई । वहां बखशिन्दः हैं सब तालिमोंके ॥
वही हैवानको इनसान करते है । कायम उनसे ईमों सालिमोंके ॥
यही सुलतान यही सुलतान यही हैं । जमीं और आप्तमोंमें यह सदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ३ ॥

तु दिलमें देखले अपने दिवाने । अदमके मुल्क जब आदम समाने ॥
न तू तब है न में और है न दुनिया । न हशमत जाहका कोई कोई कारखाने ॥
फैना सब हों रहे कोई न बाकी । पलट जावेंगे जब कुछ जिस जमाने ॥
रहेंगे बाकी आशिक अल्लाह आजिज । वही बदबखत जो हक्कसे जुदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ४ ॥

नज़म ।

तू कैसी खूब अरबी बोलता ऊंट । पकड़ लैवेगा तौभी जब तेरा घूंट ॥
जो झींगर हैं यह पण्डित सामवेदी । सो दाऊदी लहनका खूब भेदी ॥
बतक बोले अलेमानी व युनानी । रहे बाकी व तेरी भी कहानी ॥
कबूतर तीतरो बोल अरबी तुर्की । तुम्ही कह क्या खबर उस धाम धुरकी ॥