कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1232, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमझ कर ऐसा दूँढो वर कुमारी । सदा सुखसे रह अपने घर कुमारी ॥
जो आसेबसे तुझको बचावे । रहे बाकी न कोई डर कुमारी ॥
हया और शरम तेरी रख रख जहाँमें । वही भर्तार अपना कर कुमारी ॥
यह तीनों लोक है भरपूर नारी । है सबमें एकता एक नर कुमारी ॥
उसी नरको तू पहचाने जो आजिज । वही है एक तेरा वर कुमारी ॥
तु क्या बैठ लगाकर ध्यान बगला । तू अन्दरसे कपटकी खान बगला ॥
तेरे नजदीक मच्छी कोई न आवे । जो उनमें अकल हो पहचान बगला ॥
दशाकी हाट यह तूने जो खोला । न आवे कोई तेरी दूकान बगला ॥
खबर जिसने न गुरुसे अपने पाया । फँसेंगे सो तेरे जाल आन बगला ॥
खबरदारोंको आजिज क्यों फँसावे । फँसेंगे आनकर वे ज्ञान बगला ॥
तरकीब बन्द ।
हुई यह आग सत पुरुषसे पैदा । हुआ जिसपर है कुल आलम यह शैदा ॥
उसीसे तीन गुन और पांच तत्त्व है । उसीसे चौदहो प्झन्दी हवैदा ॥
है उसका कारखाना कुल जहाँमें । उसीसे खलकको की पीस मैदा ॥
सभी सुरनर मुनीश्वर उसको पूजें । यही गुरु सिख है रोगी व बँदा ॥
जहां सत पुरुषकी भगती न पावे । वहां ऐ आग तू डेरा बनावै ॥ १ ॥
उसी आतशसे पैदाइश वका है । उसीसे फेर कुल आलम फन्ना है ॥
उसी आतशकी पूजा कुल जमींमें । उसी आतशको देखो जा बजा है ॥
उसे पूजे फिरिश्ते आसमोंमें । उसीको देख कुल अर्जों समों है ॥
उसीका कारखाना सब नमूदार । वही ब्रह्माण्ड और पिण्डो बना है ॥
जहां गुरु साधुकी सेवा न होवे । वहां तू आग इल्मो अकल खोवे ॥ २ ॥
जलाया उस आगने सारा जमानः । ठगे सबको किया सदहा बहानः ॥
ठगे ब्रह्मा व विष्णु शिव भवानी । ठगे सिद्ध साधु पैगम्बर जमानः ॥
ठगे सब औलिया पीरों फ़क़ीरों । ठगे सब अस्ल दुनिया मुजरिमानः ॥
ठगे चौरासी लाख जानदार सारे । पड़ सब जालमें मुर्गी ब दानः ॥
जहां तू देख होवे साधु निन्दा । वहां ऐ आग हैं सब तेरे बन्दः ॥ ३ ॥
जहां मयनोशी व शहवत परस्ती । जहां क्रस्साब खाना और बस्ती ॥
जहांपर गोशत ख्वारी, किन्न कीनः । जहां बेखबरी बेहोशी व मस्ती ॥
हैं जो कोई झूठ जुल्मो जब्र आदी । तेरी खातिर हैं उनकी जान सस्ती ॥
हैं जो तहक़ीर करते साधु गुरुकी । उन्हीको दीन दुनियामें पस्ती ॥
जहां गुरु साधुमें हो जाय खाली । वहां ऐ आग तूने आग डाली ॥ ४ ॥