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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पहले तरगीब देकेलेवे फँसा । पीछेसे होवे फिर ख । दुनिया ॥
तेरा इनसानी बामाकर बरबाद । फेर देवेंगे यह दशा दुनिया ॥
इससे किसको है बरखोरी आजिज । पावे हरगिज न रह बका दुनिया ॥

दुनिया जो कुछ सो तेरा तन है । हेच जान इसको सोई साधन है ॥
हेच इसको जो कर तो सब कुछ हेच । फिर न दुनियाके बीच पागन है ॥
प्यार इस तनसे प्यार दुनिया है । देह दुनियाको छोड भागन है ॥
देह दुनिया नहीं तो सतगुरु देख । आखड़ा होवे तेरे आँगन है ॥
जबतलक देह दुनियासे है प्यार । तबतलक वह लगन न लागन है ॥
मारसे तुझको व्यार हो आजिज । तो मुहब्बत ये दोनों त्यागन है ॥
जो गुलामां इश्क शह आया । कुल आलमका क़िबले गह आया ॥
अर्श और फर्श सब हुये रौशन । अब मेरे घरमें मेरा मेह आया ॥
भटका फिरता था जो व्यावामें । खाके ठोकरको अपने रह आया ॥
इश्क हजरत जहां नहीं रहबर । रहमें उसके ग़ार वह छह आया ॥
इश्कसे भागजा किधर आजिज । यह अमानत जो रखने कह आया ॥

क्या हमलमें करार कर आया । उससे अब तू फिरार कर आया ॥
उसका अब तुझको नहीं कुछ होश । घेर अब अन्धकार कर आया ॥
नहीं सुनता न सूझता है कुछ । धुन्ध गर्द व गुब्बार कर आया ॥
याद अब तुझको है नहीं अपना कौल । सत्यसाहब पुकारकर आया ॥
होश करता नहीं तू ऐ बेहोश । ख्याब गुफलत खुमार कर आया ॥
होगये जीव अन्धे और बहरे । बाज़ वह हर दयार कर आया ॥
अपने बन्धनके वासते आजिज । काम तू बेशुमार कर आया ॥

जहां जाओ वहां यह नागिन है । कहरबान मिइरबान यह नागिन है ॥
सीम व ज़र वेद बानी औरत जो । भरी सारी जहां यह नागिन है ॥
जितेदुतिवाके तालिब और मतलब । ज़हर पुर दर्द यहाँ यह नागिन है ॥
काट खावें सब अहल दुनियोंको । रह बरो हमरहों यह नागिन है ॥
यही आशिक हुई वही माशूक । सब पै शहनशाह यह नागिन है ॥
लोग और वेद आजिज इसका है । साथ हरदो ज़बान यह नागिन है ॥

जगतको अन्धकार दिया उलमा । अपना घर अज्ञान भर दिया उलमा ॥
न इबादत न जोहर है तक्वा । खोल राह सक़र दिया उलमा ॥
कहां रहमान रब्ब न साध गुरु । हिर्स हैवान समर दिया उलमा ॥

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