भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सन्त महिमा अकथ सो जाने कौन । सन्त जावें जहाँ न पानी पौन ॥

निःअंगमनिःनिगम हैं साधुके भौन । आजिज वह बात और कहों तबकी॥

संत सूरत हैं सब सौंचे साहबकी ॥

यथा-ज्वरो जन व वेद बानी । है । यह गिर तारकी निशार्नी है ॥

इनसे हो जा अलग सो ज्ञानी । है मौतके तीरकी सोई गांसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

गुल खिल हैं यह तीन मायारूप । डालदे आदमी अंधेरे कूप ॥

सूझे उसको न कोई साया धूप । है यह माया मायाके तीनहूँ हाँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ।

इनको जब छोडदे सो होवे फ़क़ीर । ज़हर आलूद इनकी है तासीर॥

आजिज इनसेही मिल है पुर तक्कसीर । है सोई धर्मरायकी हँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

ग़ज़ल ।

करदिया आके अन्ध धन विद्या । कोई न मुक्ता हो पाके धन विद्या ॥

इल्मो अमलसे खबर न रही । वेखबर दिल लगाके धन विद्या ॥

जहां जाकर क्या भये दोनों । मूक उसको बनावे धन विद्या ॥

जगहमें सो नेकबख्त कहलावे । हक्कको बातिल बातवे धनन विद्या ॥

फंस मेरे कार दुनियवी दिनरात । याद हक्कको भुलावे धन विद्या ॥

तब कहाँ गुरु है और कहाँ है साधु । रहे दोजख दिखावे धन विद्या ॥

हक्को चाहे तो दोनों छोड़ आजिज । हवस दिलमें न आवे धन विद्या ॥

कारमें दुनियवी हुआ अन्धा । है तेरे वासते हुआ अन्धा ॥

डालदेवें अज़ाबमें तुझको । तब कहाँ खाला बुआ अन्धा ॥

कौन तब काम तेरे आवेगा । आके जम नाग जब छुआ अन्धा ॥

याद हकबिन जो होगया तू बैल । मोठेपर अपने धर जुआ अन्धा ॥

वेद पढ़ पढ़के क्यों हुआ नादां । मैनाही काका और तब अन्धा ॥

रहन पावें बेगैर सतगुरुके । राम क्या बोले तर सुआ अन्धा ॥

तूने उमीदकी जो समरसे । आखिर उससे उड़ा छुआ अन्धा ॥

आजिज आखिरको उस सेहो नाउमीद । देख उसमें तू था रवा अन्धा ॥

रख न उमीद बेवफा दुनिया । है यह बेसिदक़ और सफ़ा दुनिया ॥

तनको यह पालती व रूह ऊपर । करती है जोर और जफ़ा दुनिया ॥