कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextप्रकार कोई परमात्मासे भय करे तो उसका भय सच्चा कहा जा सकता है । यदि कोई कहे कि, मैं पापसे डरता हूँ और पाप भी करता जावे तो वह झूठा है ।
ऊपर कही हुई रीतियोंसे सत्यताकी अवस्थाओंमें भेद है । इन सातों अवस्थाओंमें जो दृढ़ताको धारण कर सत्य परायण हो वही पूरा सत्यधारी हो सकता है । अन्य सत्यताके सब भेद इन्हीं सातोंके अन्तर्गत हैं । जितनी जिसमें सत्यता बढ़ती जायगी उतनीही उसकी उच्चता बढ़ेगी ।
सब सांसारिक, तपस्वी, विद्याभिमानी आदि नष्ट और दुःखी हैं यदि उनमें शुद्धता और निष्कामता न हो । सत्यता और शुद्धता कांक्षा (नियत) में होती है । जो कोई ऋण लेकर पीछे देनेकी कांक्षा न रखे तो वह चोर है । यदि शुभकर्म करनेका बल न हो तो शुभ कांक्षा रखे । शुभ इच्छाका फल बहुत है जब कांक्षामें ही भेद आया तो सब नष्ट हुआ ।
शौच या शुद्धि ।
शौच नाम शुद्धिका है; दो प्रकारकी होती है । एक बहिरङ्ग तथा दूसरी अन्तरंग है । बहिरङ्गशुद्धि जल मिट्टी आदिसे होती है । अन्तरंग विवेक और विचारसे । ईर्षा, कपट, छल शत्रुता आदि आसुरी गुणोंको विवेक विचारके बलसे त्याग कर अन्तरंग शुद्धता प्राप्त करनाही सब धर्मोंवाले सामान्य भावसे मानते हैं । शुद्धतासे रहना ईश्वर सेवा और अर्थ धर्म है ईश्वर शुद्ध और स्वच्छ लोगोंको स्वीकार करता है इससे यह न समझना चाहिये कि, शरीरकी शुद्धि और स्वच्छतासे आशय है वरण शुद्धताकी चार श्रेणी हैं ।
प्रथम—ईश्वरके अतिरिक्त हृदयमें दूसरेको स्थान न दे यानी परमात्माके सिवा सब लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंसे असक्ति उठा दे.
द्वितीय श्रेणी—यह है कि, अन्तःकरणको ईर्षा, कपट, अभिमान, दम्भ आदिसे शुद्ध रखे नम्रता, धैर्य, सन्तोष, पश्चात्ताप, ईश्वरी भय, प्रेम आदि शुभ गुणोंको धारण करे । देवी सम्पत्तिसे पूर्णता प्राप्त करे । यही संयमियोंका कर्तव्य है ।
तृतीय—चुगली करना, अधर्मका खाना, विश्वासघात करना, पराई स्त्रीको कुट्टितसे देखना आदि घृणित पापोंसे अपनी इन्द्रियोंको शुद्ध रखे । यह तपस्वियोंका पद है । भोजनादि शुभ और स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है । भूलसे भी अखाद्य अथवा निषिद्ध वस्तुको ग्रहण न करे । क्योंकि, जैसा भोजन होता है वैसेही बुद्धि होती है ।