भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1292

चतुर्थ श्रेणी—शौचकी वस्त्र और स्थानादिकी स्वच्छता है यद्यपि वर्हि-
ग शौच अन्तरङ्गकी अपेक्षा तुच्छ कहा जाता है तो भी इसकी बहुत श्रेष्ठता
है, पर बहिर शौचमें नीचे लिखी बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये ।

प्रथम^१^ बहिरंग शौच स्नानादिमें इतनी अधिकता न करे कि, उससे
किसी आवश्यक काममें हानि हो। प्रायः पाखण्डी लोग बारंबार स्नान करके भी
अपनेको अशुद्धही मानते हैं, दिनभर विक्षिप्त चित्तोंके समान सन्देहमेंही पड़े
रहते हैं । ऐसे लोगोंसे लोक परलोकका कुछभी उत्तम साधन नहीं होसक्ता ।
जैसे विद्यार्थी अथवा परिश्रमी जिनको [ स्वयम् परिश्रम करके रोटी उपार्जन
करनी पड़ती है ] “पुरुषों” को शौच स्थानमें अधिकता करना हानिकारक है ।

द्वितीय—दम्भ और पाखण्डसे बचता रहे, स्नादिकी अधिकतासे दम्भी
मनुष्य अपनेको संसारमें बड़ा माहात्मा एवं शुद्ध प्रगट करते हैं अज्ञानी लोग
उनको प्रशंसा और बड़ाई करते हैं जिससे वे बारंबार उसीमें अधिक प्रवृत्त होते
हैं । जैसा कि कुछ लोग करते हैं ।

तृतीय—अवकाश और सामर्थ्य रहते हुये आलसादि कारणोंसे स्नानादि
शौचकी क्रियाका कभी त्याग न करे ।

चतुर्थ^२^—जिस शौचादि क्रियासे किसी जीवधारीको दुःख होता हो उसे
त्याग देना चाहिये क्योंकि, वह शुचि हिंसाजनक होनेसे अधर्म है । कोई पुरुष


१—कोई कोई पुरुष संशय युक्त चित्तबाले होते हैं उनके मनमें सन्देहही बना रहता है कि,
न जाने यथार्थ शुद्ध हुई कि, नहीं ? ऐसे सन्देह में पड़ा हुआ मनुष्य शुचिके यथार्थ साधनों को
छोड़कर पाखण्डमें फँस जाता है । जैसा कि, प्रथम तो भोग और कामको अशुचि — जान
उसके संयममें लगता है फिर उसमेंभी सन्देह उठाकर भोग और कामकी प्रवृत्तिकोही शुचिका
हेतु समझकर उसकी प्रवृत्तिमें लग जाता है । फिर क्या या धृष्टताके साथ खुल ख़ेलता है
अपने उत्तम पदसे पतित हो जाता है । ऐसे पुरुषोंको कोई योग्य महात्मा पुरुष यथार्थ शुचिताका
उपदेश करे तो उसमें संशययुक्त हो बारम्बार संकल्प विकल्प करता हुआ मनही मन विचार
करता है कि, न जाने यह यथार्थ स्नान है कि, नहीं ? इस स्नानसे मैं शुद्ध होऊँगा कि नहीं ?
जो मुझे उपदेश करता है वह स्वयम् पवित्र महात्मा है कि नहीं ? ऐसे २ संशय करके उसके
उपदेशको छोड़ दूसरेकी शिक्षा सुननेमें लग जाता है । इसी प्रकार होते होते किसीकी बाहिरी
चटक मटक और गपोड़में फँसकर उसके दोषोंको न विचारता हुआ अनाचार्यमें प्रवृत्त हो पापका
भागी बनता है । दुःख पड़नेपर उससे विरक्त हो अन्यके पास जाता है वहाँसे भी दूसरेकी
शरण लेता है । ऐसे संशयात्मक पुरुषोंको कभी भी पवित्रता नहीं दीखती कभी न सुखकीही
प्राप्ति होती है वरन् सर्वदा शोकित रहता है ।

२ आजकल प्रायः दाम्भिक लोग ऐसा करते हैं कि, उनकी मण्डलीमें कोई किसी रोगके
कारण नहा न सके तो उसे छूनेमेंभी पाप समझते हैं । जबतक वह स्नान न करले तबतक
चाहे वह प्याससे मर भी जाय पर जल देना नहीं चाहते वरन् उसे भ्रष्ट, अशुद्ध आदि कठोर
शब्दोंसे दुखी करते हैं ।