भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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किसीसे मिलना चाहता हो पर वह अपने शुद्धिके अभिमानमें उससे घृणा करे तो यह कुकर्म हैं इसे त्यागना उचित है ।

पंचम—भोजनमें संयम आवश्यक है । शुद्ध भोजन ग्रहण करे अशुद्ध न करे ।

षष्ठम—संयममें इतनी अधिकता न करे जिससे दूसरोंको हानि पहुँचे । कोई तो किसीके आवश्यक कामको छोड़ करभी खड़ा रहे पर यह स्नान करनेमेंही दो चार घण्टा लगा दे ।

स्नानके भेद—स्नान दो प्रकारका है १ अन्तरङ्ग, २ बहिरङ्ग । अन्तरङ्ग । स्नान तीन प्रकारसे होता ॥ १—अन्तरङ्ग स्नान यह कि, सब अंगोंको पापसे शुद्ध रखे ।

दूसरा—बुरी आदतोंसे अन्तःकरणको शुद्ध रखे ।

३—ईश्वरके सिवा दूसरेको न देखे ।

बहिरङ्ग शुद्धि—भी तीन प्रकारकी है ?

१—देह गेहूको मृत्तिका जलादिसे शुद्ध रखे ।

२—बिना माँगे किसीके पदार्थमें स्वत्व न रखे ।

३—शारीरके बाल, नख आदि पदार्थोंसे शुद्ध रखे, आँख, कान, नाक आदिको शुद्ध करता रहे । बहिरङ्ग शुद्धि जल और मिट्टीसे होती है । अन्तरङ्ग शुद्धि विचार और विवेकसे होती है ।

सूर्य, चन्द्र तथा देवस्थान अथवा किसी प्रतिष्ठित स्थानकी ओर पीठ करके मुत्र पुरीष करने न बैठे । अग्नि, जल, राख, पृथ्वीका छिद्र, कठिन और तपी हुई पृथ्वी, गौली पृथ्वी आदिमें भूलसे भी मल मूत्र न त्यागे ।

धर्मका तीसरा चरण—दान है । दान बहुत तरहके हैं । यदि दान सुपात्रको


१—काममें तीन दोष प्रधान हैं वे चोरी, व्यभिचार और हिंसा ये हैं ।

वाणीमें तीन दोष हैं—निन्दा, गाली और मिथ्या लाप ।

मनके—क्रोध, ईर्षा, मान, छल ये चार दोष हैं ।

२ दीन पुरुषोंपर दया करके अन्न, वस्त्र, धन आदिसे सहाय करनेको “दान” कहते हैं यद्यपि इसमें देशकाल पात्रका भी विचार आवश्यक है तो भी यथार्थ दाता इस विलम्बको योग्य नहीं समझता क्योंकि, मनका स्वभाव है कि, क्षणमात्रमेंही अनेक संकल्प विकल्प कर लेता है, क्या जाने कुछ क्षण पीछे देनेका संकल्पही जाता रहे । इसी कारण उदार पुरुषको जिस समय दानकी बुद्धि होती है उसी समय दान करता है विलम्ब नहीं करता ।

दो प्रकारका दान है ।

एक उत्तम और दूसरा अनुत्तम । वह उत्तम दान है जो कि, दीनको देखकर द्रवित-

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