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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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धर्मदास वचन— चौपाई ।

हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहवौ कर भाऊ ॥
कहौ लोककी बात बिचारी । जहैलौ दीप करी विसतारी ॥
बरनौ दीप गुप्त अनुसार । बरनौ जहैललिग सकल पसारा ॥
बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तिनको फिर कैसे निरमाऊ ॥
पुरुष स्वास जेता अनुसार । ताकर कहो सकल विसतारा ॥
केहि विधि सोरह सुत परगासा । कहो केही कहाँ रहिवासा ॥
कहो बिस्तार सकल अस्थाना । सत्यलोक और जमके थाना ॥
कैसे निरगुन परभुहि कीन्हा । कैसे पांच तत्वको चीन्हा ॥
कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्ही । कैसे रची देहकर चीन्ही ॥
कैसे भय निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥
कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जान बाजी जम दीन्हा ॥
कैसे चित्त अचित्त तन दीना । कैसे जीव सीव कर लीना ॥
कैसे इन्द्दी देह बनाई । कैसे जीव परा बसि आई ॥
कैसे जीव अपन पौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥

सयय—काया मध्ये स्वास है, स्वासा मध्ये सार ।

सार शब्द बिचारिके, साहब कहो सुधार ॥

सतगुरु वचन— चौपाई ।

कहै कबीर सुनो धर्म दासा । अहंकार जस कीन तमासा ॥
अहंकार कीन यकं थाती । तासे होय दिवस अरु राती ॥
बाजीगर यह जाल पसारा । धंधे लाय दियो संसारा ॥
काम क्रोध लालच अरु मोषा । जाल पसार सगरो ये धोखा ॥
एती जाल पास संसारा । विरला गुरु मुख उतरे पारा ॥
धरमदास जो पूछेहु आई । आदि अंत सब कहों बुझाई ॥
कहों लोक लोककी बानी । कहों पुरुष सुतकी उत्पानी ॥
कहों संदेश दया करि तोही । भुक्ति जानि जो पूछहु मोही ॥
सुनहुँ संदेश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छै माना ॥
सुमिरहु आदि पुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय—तीन लोकके भीतरे, रोकि रहो जम द्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सकल संसार ॥