कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रमाण श्वास गुञ्जारका ।
देखो प्रकरण दशवाँ, पृष्ठ २७ ।
कबीर बचन—चौपाई ।
कहे कबीर सत्य प्रकाश । श्रोता सुरति धनी धर्मदासा ॥
सत्य सार सुकृत गुन गावों । अविचल बाँह अच्छे पद पावों ॥
संशय रहित सदा सो गाऊँ । शीलरूप सब हितकर नाऊँ ॥
करै कुलाहल हंस उजागर । मोह रहित सब सुखके सागर ॥
तेहि पुर जरा मरन भ्रम नाही । मन विकार इंद्री नहिं ताहीं ॥
सत्यलोक हंसन सुख होई । सो सुख इहाँ न जाने कोई ॥
जाने सो जो उहाँ रहाई । इहूवाँ आय कहै समुझाई ॥
आवत जात बार नहिं लावे । उहाँकी चाल सो इहाँ चलावे ॥
जो समझे सोइ उतरे पारा । बिन समझे जब जमके चारा ॥
समय—अमरलोककी महिमा, सत्य शब्द उपदेश ।
हंस हेतु सों बरनों, छूटे जमकर देस ॥
अमरलोककी अविगति बानी । धरमदास मैं कहूँ बखानी ॥
जो समझे सो उतरे पारा । बिन समझे सब जमके चारा ॥
धर्मदास बचन ।
प्रथम शरन सतगुरु गुन गाऊँ । अच्छरभेद सकल सुधि पाऊँ ॥
सत्यलोक कर भाव अपारा । सो भवसागर करै पसारा ॥
भाषो अग्र अग्रकी बानी । भाषो द्वीप जहां लगि खानी ॥
भाषो पुरुष पुरुषकी काया । भाषो अमी अमान अमाया ॥
भाषो पुरुष लोककी बानी । भाषो सबै सहज सहिदानी ॥
जो काया प्रभु आप सँवारा । सो समुझाइ कहौ व्यवहारा ॥
अमर तार अखंडित बानी । स्वासा पार सार सहिदानी ॥
जब का प्रभु कीन बन्धाना । कहौ विचारि तासु सहिदाना ॥
जोतिक स्वासा पुरुषकी देहा । तार तार कर कहो सनेहा ॥
कबीर बचन ।
अमर तार अखंडित बानी । स्वाँसा सार पार सहिदानी ॥
जेता बचन पुरुष उच्चार । तेता बचन नाम अधिकारा ॥
स्वासा पारम आदि निरबाना । सोरह सुतकी नाल बखाना ॥
समय—पंच अमीकी देह धरि, प्रकटी जोति अपार ।
सुरतिवंत निहतत्त पुर, होत स्वाँस गुंजार ॥